पत्थलगड़ी आंदोलन से सबसे ज़्यादा प्रभावित इलाक़ों में क्या हो रहा है?

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पत्थलगड़ी आंदोलन को जिस तरह सरकार ने दबाया और जिस तरह मीडिया ने उसे दिखाया, उससे स्थानीय लोग बेहद ख़फ़ा हैं.


जमशेदपुर से खूंटी की तरफ़ जाने वाला रास्ता बेहद शांत और ख़ूबसूरत है. सड़कें चिकनी हैं, आस-पास हरियाली है. लेकिन इन तमाम हरियालियों और शांति के बीच मुंडा आदिवासियों के मन में आज भी उथल-पुथल है.


वो किसी भी बाहरी व्यक्ति का स्वागत नहीं करते. ऐसा नहीं है कि वो आपके साथ मारपीट करेंगे. भगा देंगे या गाली-गलौज. बस, वो संवाद नहीं करते. करते भी हैं तो अपनी भाषा मुंडारी में, जिसे समझना हम हिंदी वालों के वश में नहीं. 


वजह साफ़ है. पिछले साल खूंटी के कई गांवों में मुंडा आदिवासियों के मूलभूत सविधाओं की कमी को लेकर आंदोलन किया. इसे उन्होंने पत्थलगड़ी का नाम दिया. पत्थलगड़ी मुंडा आदिवासियों की एक पुरानी प्रथा भी है. आदिवासियों के अपने गांव के बाहर बड़े-बड़े पथल लगाने शुरू किए. बाहरी लोगों को प्रवेश करने से रोका. सरकारी सविधाओं का बहिष्कार किया और अपनी ग्राम सभा को सबसे बड़ी ताक़त बताना शुरू किया. इस दौरान पुलिस से इनकी झड़प हुई. देशभर की मीडिया में ख़बरें बनी. प्रशासन की सह पर छपने वाली खबरों में इन्हें देशद्रोही कहा गया. पुलिस ने इनकी घेराबंदी ख़त्म करने के लिए बल का प्रयोग किया और लिखने वालों ने अपनी कलम का. देखते-देखते इस इलाक़े के आदिवासी देशद्रोही ठहरा दिए गए. जेलों में ठूंस दिए गए. इन्हें अफ़ीम की खेती करने और बलात्कारियों का बचाव करने वाला बताया गया. 


पत्थलगड़ी का आंदोलन जिन इलाक़ों में फैला उनमें पातराडीह भी एक है. जब हम यहां पहुंचे तो यहां हमें एक स्कूल दिखा. स्कूल का भवन सरकारी है, लेकिन उसमें पढ़ा रहे लोग स्थनीय हैं. वो इलाक़े के साठ-सत्तर बच्चों को स्थनीय मुंडारी भाषा में पढ़ा रहे हैं. पढ़ाने वाले युवक का नाम है-अमित मुंडा. 

बिना कैमरे के अमित ने हमसे हिंदी में बात की लेकिन उन्होंने साफ़-साफ़ कहा कि कैमरे पर वो केवल अपनी भाषा में ही बात करेंगे. क़रीब-क़रीब आधे घंटे मनाने के बाद भी अमित ने कैमरे पर हिंदी में बात नहीं की. हिंदी भाषियों या बाहरी लोगों के प्रति नाराज़गी दिखाने का ये उनका अपना तरीक़ा है. 


मुंडा आदिवासियों में भगवान का दर्जा पाए बिरसा मुंडा के गांव उलीहातु से होते हुए हम पहुंचे पत्थलगड़ी आंदोलन के सबसे ज़्यादा प्रभावित गांवों में से एक उदबरू में. मुख्य सड़क से सटे इस गांव में दाख़िल होने से पहले ही आपको नीले रंग के तीन पत्थर दिखते हैं. साथ ही एक जर्जर मकान भी दिखता है जिसपर मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा है- no job, no education. हम अपने बच्चों को वीर बिरसा मुंडा बनाएंगे. आदेशानुसार ग्राम सभा उदबरू. मुझे मालूम है कि आप सोंच रहे होंगे कि हम किसी गांव में क्यों नहीं गए. लोगों से बात क्यों नहीं की. तो इसका जवाब वीडियो में है. हमने कई बार कोशिशें कीं, लेकिन असफ़ल रहे. वीडियो में देखिए कि अंदर हम क्यों नहीं जा सके.

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