ગુજરાત : જાતિના પ્રમાણ પત્ર ની તપાસ માટે ના પુરાવામાં “पिठौरा देव” વધુ જાણો.

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અત્યારે ગુજરાત રાજ્ય માં છોટાઉદેપુર જીલ્લા ના રાઠવા આદિવાસી સમાજના લોકોના જાતિના દાખલાની તપાસ અનુ.જનજાતિના જાતિના પ્રમાણ પત્ર ની તપાસ કમિશ્નર શ્રી, આદિજાતિ વિકાસ . બિરસા મુંડા ભવન ગાંધીનગર દ્વારા કરવામાં આવી રહી છે.

આ અનુ.જનજાતિના જાતિના પ્રમાણ પત્ર ની તપાસ માં પીથોરા દેવ અંગેના ફોટોગ્રાફ રજુ કરવા માટે જણાવવામાં આવે છે. તો પીથૌરા દેવ વિષે આપે જાણવું જરૂરી છે.

અહી પીથૌરા દેવ વિષે વધુ માહિતી દર્શાવેલ છે. બીજાને મદદ થાય તેબદલ સેર જરૂર કારસો

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#myadivasi #indigenous #tribal #aboriginal

#जय_आदिवासी
वाघ देव – वाघेस्थल ( छोटा उदेपुर)
छोटा उदेपुर जिले के शहर से जो बड़ा पर्वत दिखता है उसे वाघेस्थल कहा जाता है। क्योकी यह बाध आकर बसता था। ऐसा यहां के पुजारा का कहना है। उनकी पीढ़ी ही यहां पर बाधदेव की विधि करता आया है। एक बार बलि चढ़ाने के लिए बकरा लाया गया था उस वक्क्त बाघ भी वहां आया और बकरा उसके साथ भाग गया उसके बाद वो बाघ के साथ बैठा रहता ऐसा कहना हैं। जो उदेपुर जिले के राजा फतेसिंह है बो भी यहां पूजा के लिए आते उन्हों ने यहां पर पानी पीने के लिए एक वाव भी बनावाई है। , इस पहाड़ी से पूरा प्राकृतिक नज़ारा दिखाई देता हे। पूरा उदेपुर शहर यहां से दिखाई पड़ता है । सभ्य ओर असभ्य लोगों की दुनिया का जो डिफरेंट है वह यहां से दिखाई पड़ता है।

#जय_आदिवासी
गाव- अंबाला , तहसील – छोटा उदेपुर , जिला- छोटा उदेपुर
बाबा पिठौरा पर खोज करते करते अंबाला गाव जाना हुवा , वहां पर मेरी रिसर्च का अब तक का पुराना बाबा पिठौरा मिला जो सन 17-04-1972 में लिखा गया था। जिसके धर मालिक का नाम रधु घुलजी भाई रावतला है। वह दीवार मिटी की बनी है। अभी तक उन्हों ने उसको सम्भालकर रखा है। आदिवासी राठवा समुदाय में बाबा पिठौरा को बहुत आदर के साथ पूजा जाता हे। अगर उनकी दीवाल पर की पपड़ी भी हो तब भी उसे पूजा जाता है।

देव स्थानों को भी वहां के आदिवासी ने बहुत महत्व दिया है। अब तक कि खोज में जहां जहाँ देव स्थान पाए गए है वहा पर एक घनी जंगल जैसी जगह होती है। वहा पर एक भी पेड़ काटा नही गया। यह इस बात की साबिती देती है कि आदिवासी प्रकृति को पहले प्राधन्य देते है।

अंबाला गाव कर देव एव उनके नाम लिखे है। आदिवासी सस्कृति दूजी संस्कृति से काफी अलग पड़ती है। पर कुछ धार्मिक सन्गठन का इसमे सस्क्रमण करने का इरादा रहता हे। हमे इससे बचाकर अपनी संस्कृति को बचाना होगी। अपनी संस्कृति अपनी पहचान है। अपने देव स्थल जाने उसको बचाये।

#जय_आदिवासी
आज मेरे गाव में दिवाली है (गाव- नानी साँकल, कवांट)

दुनिया कैलेंडर व्यवस्था से चल रही है तब राठवा आदिवासी समुदाय की अपनी अलग व्यवस्था है जिनसे वह चलते है। जो कोई व्यवस्था में बदलाव आता है तो जो आदिवासी कुदरती व्यवहार से चलता है उन्हें कोई फर्क नही पड़ता। चाहे मंदी आये या तेजी उन्हों ने व्यवस्था में भाग नहीं लिया है तो उन्हें कोई फर्क नही पड़ता।

( तात्पर्य – वनवासी तुमने कहा, वनबंधु तुमने कहा , गिरीजन तुमने कहा , एव आदिवासी भी तुमने कहा है। आप हमें आदिवासी कहो या ना कहो उनसे फर्क नही पड़ता। , सेंटिनल टापू पर आदिवासी रह रहे है उन्हें साबित करने की कोई जरूरत नही की वो आदिवासी है।आप उन्है आदिवासी में से निकालो या नही उनसे उन्हें कोई फर्क नही पड़ता।)

कुछ लोग जो नकली आदिवासी बन बैठे है या सिर्फ रिज़र्वेशन के लिये आदिवासी बने है उनकी जिंदगी पर थू हैं। हमे 1 दिन का आदिवासी नही बनना है। हमे आदिवासियत भी जिंदा रखनी है जिससे हम प्रकृति से तालमेल बनाये रखे एव उनकी रक्षा कर सके। इस लिए आदिवासी नही आदिवासियत बचाओ।

दिवाली हमारे गाव में अलग हो रही है मतलब हमारी संस्कृति और हमारे लिए दीवाली की कहानी कुछ और ही है।

जोहार धार कबीलाई।

#जय_आदिवासी
कालूराणा देव , कठीवाड़ा ( मध्यप्रदेश)
हमारे खत्रिज हमारे देव है। , कठीवाड़ा के पहाड़ियों में हमारे खत्रिज स्थापित किये गए हैं। पूर्णरूप से प्रकृति के बीच मे ही देव स्थापित किये गए हे। ओर वहां के आदिवासी द्वारा उनका बेहत अच्छे से ख्याल रखा गया है।
(जानकारी क्रमशः धर की दिवालो में से निकलकर जगहो पर जाए , जानकारी मिलेगी एव सस्कृति क्या है वह भी पता चलेगी , अन्यथा मुजे सम्पर्क करें)

#जय_आदिवासी
राठवा आदिवासी सस्कृति की पहचान का महत्व पूर्ण हिस्सा बाबा पिठौरा है। मध्यप्रदेश के उमराली में भी बाबा पिठौरा होता है। राठवा की संस्कृति और मध्यप्रदेश के बॉर्डर की संस्कृति एक ही है। पहली बार आपने ऐसा पिठौरा देखा हॉगा।

यह जो पहले बाबापिठौरा करते थे उसमे हमारी प्राकृतिक चीज जो कुदरत से प्राप्त होती है उसीसे बनाते है। अभी के गुजरात में बाबा पिठौरा होता है उसमें थोड़े कलर का यूज भी होता है। एक बहुत महत्वपूर्ण बात है कि पिठौरा लिखना शुरू हुआ तब से लेकर अब तक जो बाबा पिठौरा का लेखन होता है उसमें बदलाव नही आया हैं। गहंन देव , मा रानी काजल , बार घड़ नो घणी यह, राजा भोज का हाथी सब अब भी लिखे जाते है।

जिनके घर हम गए थे उनकी सात पीढ़ी से लेकर अब तक पिठौरा को बचाये रखा है। उनका कहना था हमारा अस्तित्व इनसे ही है। हमारे देव यही है, सबसे पहला प्राधन्य हमारा यही रहेगा। साथ मे उनके नजदीक मा राणी काजल का स्थान भी था वहां की भी तस्वीर रखी है।

अपनी संस्कृति बचाये , अस्तित्व बचाए

Credite: Anand Dharva

Dr Bhavin Vasava


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