प्राइवेट कंपनियों को बतानी होगी अपने यहां खाली वैकेंसी, बेरोज़गारी के सामने बेबस सरकार का नया नियम

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नरेन्द्र मोदी सरकार ने 2014 में दो करोड़ रोज़गार का वादा किया था.

सरकार रोजगार दफ्तरों के मौजूदा स्वरूप में बड़ा बदलाव करने की बात कर रही है.केंद्र सरकार की योजना देश में तैयार हो रहे मॉडल करियर सेंटर में निजी कंपनियों की भी भागीदारी तय करने की है. जानकारी के अनुसार अब निजी कंपनियां भी भर्तियों के लिए रोजगार दफ्तर के तैयार हो रहे नए स्वरूप ‘मॉडल करियर सेंटर’ में जानकारी दिया करेंगी.

नए नियम के हिसाब से जिस भी कंपनी में 25 से ज्यादा वैकेंसी होने की हालत में उन्हें इसकी जानकारी मॉडल करियर सेंटर को देना जरूरी किया जाएगा. इस नियम के तहत यह व्यवस्था भी की जा रही है कि अगर कोई कंपनी गलत जानकारी देती है तो ऐसी कंपनियों के खिलाफ एक्शन भी लिया जाएगा. इस बारे में ख़बरों के मुताबिक ईपीएफओ में रजिस्ट्रेशन के आधार पर सरकार हर कंपनी में भर्ती हुए लोगों के आंकड़े पता करेगी और नियम का पालन न करने वाली कंपनी पर जुर्माना लगाया जाएगा.

दरअसल सरकार को लगता है कि निजी कंपनियां खाली पदों और अपने यहां काम करने वाले लोगों की सही सही जानकारी नहीं दे रही हैं. सरकार मान रही है कि इस कदम से देश में रोजगार के मौकों की जानकारी भी जरूरतमंदों को आसानी से मुहैया होती रहेगी. यही नहीं इसमें व्यक्ति को पंजीयन के बाद नौकरी मिलने की हालत में अपना रजिस्ट्रेशन रद्द कराना भी जरूरी होगा.

रोजगार कार्यालयों के माध्यम से इतने लोगों ने पाई नौकरी

ज़्यादातर राज्यों में अब रोज़गार कार्यालय का कोई मतलब ही नहीं रह गया है. मसलन 2016 की बात की जाए तो बिहार में 1900, हरियाणा में 400, झारखंड में 2500, उत्तराखंड में 300, उत्तर प्रदेश में 1500 लोगों को नौकरी मिली थी. वहीं दिल्ली में किसी को भी ऐसे दफ्तर से रोजगार नहीं मिला था. गुजरात में 3.30 लाख लोगों को नौकरी मिली थी.


रोजगार की सही तस्वीर नहीं

देशभर में 997 रोज़गार दफ्तर हैं. सरकार ने 164 रोजगार दफ्तरों को मॉडल करियर सेंटर में तब्दील करने की मंजूरी दे दी है. बताया गया है कि सरकार ने इसके लिए 43.5 करोड़ रुपये का फंड भी स्वीकृत कर दिया है. सरकार ने संसद में जानकारी दी है कि इस रकम में से करीब 13 करोड़ रुपये खर्च भी किया जा चुका है.
सरकार का मानना है कि रोजगार दफ्तरों से आने वाले आंकड़ों के जरिए राज्यों में रोजगार की सही तस्वीर सामने नहीं आ पाती है. सरकार की तरफ से लोकसभा में दी गई जानकारी में रोजगार दफ्तरों में रजिस्टर लोगों का राज्यवार ब्योरा दिया गया है.
दरअसल सरकार पर रोज़गार के अवसर पैदा करने का भारी दबाव है. लेकिन अर्थव्यवस्था की जो हालत है उसमें रोज़गार के नए अवसर पैदा करने तो दूर की बात है, जिनके पास फ़िलहाल रोज़गार हैं उन्हे ही बचा कर रखना मुश्किल हो रहा है. उस पर सरकार की अपनी ही एजेंसी ही बता चुकी हैं की देश में बेरोज़गारी की दर 45 साल में सबसे उंची है. 

सरकार के लिए रोज़गार और अर्थव्यवस्था से जुड़े आंकड़े जी का जंजाल बने हुए हैं. सरकार की यह कोशिश भी रोज़गार के अवसर पैदा करने से ज़्यादा आंकडे सुधारने की ज़्यादा नज़र आती है.
 

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