आदिवासियों पर अंग्रेजों से भी ज्यादा सख्त है सरकार

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अंग्रेजों का फॉरेस्ट एक्ट हमेशा आदिवासियों के ख़िलाफ़ हथियार के तौर पर इस्तेमाल होता था. सरकार इस क़ानून को भयानक रूप देकर अंग्रेज़ों से आगे निकलना चाहती है.

देखिये इसमें दो कानून हैं. एक है फॉरेस्ट राइट्स यानी वनाधकिार कानून. ये 2006 में बनाया गया था. उस कानून को आज सुप्रीम कोर्ट में रिटायर्ड फॉरेस्ट्स अधिकारियों  ने चुनौती दी है. उन्होंने बुनियादी मुद्दे उठाए कि संवैधानिक रूप से सरकार का कोई अधिकार ही नहीं है कि इस प्रकार का कोई कानून बनाए. हैरानी की बात ये है कि सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ उसको दाखिल ही नहीं किया बल्कि उस याचिका के आधार पर उन्होंने लाखों आदिवासी जिनके पास पट्टा नहीं है उनको जंगल से निकालने की पूरी इजाज़त दे दी. हमारे संगठन आदिवासी अधिकार राष्ट्रीय मंच के राष्ट्रीय संयोजक जितिन चौधरी के नाम से भी एक याचिका दायर की गई है.

एक दूसरा कानून है फॉरेस्ट एक्ट जो अंग्रेजी शासन के समय 1927 में बना था. फारेस्ट एक्ट जो हमेशा आदिवासियों के ख़िलाफ़ हथियार के तौर पर इस्तेमाल होता था. सरकार इस क़ानून को भयानक रूप देकर वो करने जा रही है जो अंग्रेज़ सरकार नहीं कर पाई थी. इसके लिए उन्होंने 91 नए उपनियम बनाए हैं. पर उनके मुताबिक ये इस कानून का प्राथमिक रूप है. अगर सरकार प्राथमिक रूप में आदिवासियों के इतने खिलाफ जा सकती है तो आगे न जाने क्या होगा. और यही कारण है कि पूरी दुनिया में इसका विरोध हो रहा है.

पूरे तौर पर उसके तीन आधार हैं. एक उसका केन्द्रीयकरण. अभी हमारे कानून में 1927 के बाद हिन्दुस्तान के आदिवासियों के संघर्षों के आधार पर और हमारे राष्ट्रीय नेताओं की प्रतिबद्धता के आधार पर कुछ विशेष प्रावधान हैं आदिवासियों के लिए और उसमें ग्राम सभा का बहुत महत्वपूर्ण रोल है.

आप इन 91 संशोधनों में ग्राम सभा का ज़िक्र तक नहीं ढूंढ़ पाएंगे. उसके विपरीत ये है कि जो ग्राम सभा के अधिकार तमाम कानून में दर्ज हैं उसको ख़त्म करके जॉइंट फारेस्ट मैनेजमेंट के नाम पर संयुक्त वन संस्थाओं जिनमे आदिवासियों का कोई नामोनिशान नहीं है, सरकार उनकी समिति बना कर उनको वनों की देखरेख के लिए नियुक्त करेगी.

एक बात तो है केन्द्रीयकरण. इस हद तक की सब जगह केंद्र सरकार ने अपने रोल उस क़ानून में लिख दिए हैं. अगर राज्य सरकार भी कुछ करना चाहती है तो उसे पहले केंद्र सरकार से मंज़ूरी लेनी होगी. और सबसे ज़्यादा खतरनाक जो केन्द्रीयकरण है वो वन नौकरशाहों के हाथ में है. जो ये तमाम अधिकारी हैं उन्हीं की समिति बना कर उन्होंने ही इस कानून में संशोधन कराए हैं. और आज वो ये चाहते हैं कि जो कुछ भी वन संबंधित है वो सब उन्हीं के अधिकार हैं. फारेस्ट सेटलमेंट अधिकारी के पास सब अधिकार हैं.

ये अधिकारी जो काम अंग्रेजी हुकूमत में नहीं कर पाए वो सरकार में कर रहे हैं. अगर आपको वन में सांस भी लेना है तो पहले इन अधिकारियों की इजाज़त लेनी होगी. आदिवासी की जिंदगी जीने के लिए भी लाइसेंस लेना होगा.

अपराधीकरण का मतलब है कि यदि में एक आदिवासी महिला हूं और मैं वन में जाती हूं  ये मेरा अधिकार है कि मैं वन से महुआ के फूल, तेंदू के पत्ते या अपने घर के लिए लकड़ी या मधु ला सकती हूं. आदिवासी होने के नाते ये सब मेरा अधिकार है. लेकिन अब सरकार ने मेरे इन सब अधिकारों को अपराध की श्रेणी में डाल दिया है.

अगर आप वन से मधु, लकड़ी या पत्ता लेने जाते हैं तो ये अपराध है. ये उस समय अपराध नहीं है अगर आपके पास कोई लाइसेंस है. अपराधीकरण का अर्थ ये है कि अगर वो अपराध है और अगर में फॉरेस्ट ऑफिसर के सामने ये साबित नहीं कर सकती हूं कि ये मेरा अधिकार है. ये अन्याय का ऐतिहासिक बोझ कहलाता है.

मुझे अपनी जिंदिगी के हर पहलू को साबित करना है कि ये क़ानूनी है. इस कानून के आधार पर जो मेरे अधिकार संविधान में दर्ज हैं वो सब बदल गए हैं. अगर में इस प्रकार का कोई भी अपराध करती हूं जैसे जंगल से पत्ता लकड़ी या फूल लाना.

तो ये कानून फॉरेस्ट ऑफिसर को मेरे ख़िलाफ़ बंदूक का इस्तेमाल करने का अधिकार देता है. साथ ही उन्हें जंगल के अंदर लॉकअप बनाने की भी इजाज़त देता है. वो उस लॉकअप में बंदूक, गोली, जंजीर, लाठी आदि रख सकते हैं ताकि वक़्त आने पर  वो उन सब हथियारों का मेरे ऊपर प्रयोग कर सके.

हमारे कानून के हिसाब से में उस वक़्त तक निर्दोष हूं जब तक सरकार मेरा दोष साबित न कर दे. पर इस क़ानून के हिसाब से आदिवासी दोषी है और उसकी ये ज़िम्मेदारी बनती है कि वो साबित करे कि वो दोषी नहीं है. और जो कोर्ट की प्रक्रिया है वो यह है कि जो सत्र अदालत है उसका फैसला ही सर्वोपरि होगा. अगर आदिवासी हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट जाना चाहे तो वो नहीं जा सकता. और दूसरी चीज़ ये है कि इन मामलों में कोर्ट में समरी ट्रायल की प्रक्रिया अपनाई जाएगी जो सामान्य प्रक्रिया से अलग है.

एक और खतरनाक चीज़ है जो आर्मी के पास भी नहीं है. अगर मुझे हिरासत में लिया जाता है और  मुझे टॉर्चर करके मेरा बयान ले लिया जाता है तो उसे अदालत नहीं मानती. वो कहती है की हिरासत में तुमने ज़बरदस्ती ये बयान लिया है. लेकिन इस कानून में ये अधिकार है कि मुझे बंद करे, ज़बरदस्ती करके मेरा बयान लिखवाए और उस बयान की अदालत में मंज़ूरी होगी.

ये एक बहुत खतरनाक कानून है. आपको सुनकर हैरानी होगी कि सरकार एक नेशनल फॉरेस्ट्री बोर्ड बनाने जा रही है और उस बोर्ड का चेयरमैन देश के प्रधानमंत्री होंगे और उसके मेंबर देश के सेनाध्यक्ष होंगे. ये पूरी तरह से सैन्यीकरण है. इसका सबसे बड़ा प्रतीक है सेनाध्यक्ष का उस बोर्ड में मौजूद होना.

अभी सरकार ने एक नया कॉन्सेप्ट बनाया है उत्पादन के लिए वन. इसका मतलब है कि पूरे वन का इलाका व्यापार के लिए या उद्योग के लिए इस्तेमाल  होगा. मिसाल के लिए अगर मेरा पेपर मिल है और मुझे आज टिम्बर की ज़रूरत है तो सरकार कहेगी की ये पूरा वन तम्हारे लिए है. तुम्हारी जो मर्ज़ी उस चीज़ का उत्पादन करो. बस इसके बदले तुम हमें कुछ फ़ीस, पैसे या सेस दे दो.

सरकार वन को बचाने का नक़ाब पहनकर वाणिज्यीकरण और मुनाफे के लिए वन का इस्तेमाल करना चाहती है. ये इस नए संशोधन में स्पष्ट है और उसमें आदिवासी के लिए स्थान नहीं है. पारंपरिक वनवासी के लिए स्थान नहीं है लेकिन अगर सरकार चाहे तो व्यापारियों के लिए, उद्योगपतियों के लिए, खदान मालिकों के लिए पूरा का पूरा वन उत्पादन के लिए घोषित किया जा सकता है.

मिसाल के तौर पर अभी में असम में थी तो लोगों ने बताया कि असम में बाबा रामदेव ने बोदो इलाके को अपनी दवाइयों और हर्ब्स के लिए लिया है. तो उनके लिए ये तोहफा ही हो सकता है कि पूरा इलाका उनको दे दिया गया है, आप इसमें अपना उत्पादन कीजिए. इससे सरकार की दोहरी नीति स्पष्ट होती है उद्योगपतियों के लिए मंज़ूरी और आदिवासियों के लिए तुम अपराधी हो तम्हारी जगह जेल में है.

ये और भी खतरनाक है कि वो आदिवासी समुदाय की परिभाषा ही बदल रहे हैं. अभी उन्होंने वन के समुदाय में आदिवासी शब्द ही गायब कर दिया है. वो कहते हैं कि इसमें किसी जाति, वर्ग, लिंग का कोई अंतर नहीं है. पर हकीकत ये है कि आपने कम्युनिटी को ऐसे परिभाषित किया है कि आदिवासी शब्द ही जो वन का मुख्य समुदाय है आपने बिल्कुल गायब ही कर दिया है और आपने सबको बराबर का अधिकार दे दिया है. इसका मतलब है कि किसी का भी अधिकार नहीं है.

और सबसे अधिक हमला इस पूरी परिभाषा का आदिवासियों पर हुआ है. इसलिए कुल मिलाकर हम कहेंगे कि ब्रिटिश जो नहीं कर पाए आज फॉरेस्ट को एक तरफ विकास, संरक्षण, वन बचाओ के नाम पर, जो सबसे अधिक वन बचाने वाले हैं आदिवासी उन्हीं को आप निकालना चाहते हैं.

देखिये मैं विपक्ष की बात तो कर नहीं सकती क्योंकि हकीकत है कि इस चुनाव में आदिवासियों के मुद्दे या दलितों के मुद्दे कोई मुद्दे थे ही नहीं. ये सब किनारे कर दिए गए थे और एक तथाकथित राष्ट्रवाद के नाम पर पूरे देशभर को बहुत गलत तरीके से बनाने का प्रयास किया गया.

ये का जो पूरा अभियान था वो लोगों की जीविका के सवाल पर नहीं था और वो अगर होता तो अलग बात होती. तो कभी-कभी देश के इतिहास में ऐसा हो जाता है कि इतना कोई बड़ा मुद्दा पैसे के साथ, बल के साथ मीडिया की मदद के साथ वही एक मुख्य मुद्दा बन जाता है और इस बार चुनाव में आदिवासियों की आवाज़ कही सुनी नहीं गई थी.  आदिवासियों ने भी आदिवासी के रूप में वोट नहीं दिया. वो सब भी अन्य नागरिकों की तरह नकली राष्ट्रवाद के मुद्दे से प्रभावित होकर वोट दिए.

लेकिन मैं समझती हूं कि जो उनकी दैनिक जिंदिगी है, रोज़मर्रा का जो संघर्ष है उसका राजनीतिकरण करने की ज़रूरत है.

में विपक्ष का तो नहीं कह सकती हूं लेकिन निश्चित रूप से मेरी पार्टी या मेरी पार्टी से जुड़े हुए या हमारी विचारधारा से जुड़े हुए लाखों कार्यकर्ता कटिबद्ध हैं इस बात को लेकर कि हम कैसे हम इन तमाम बुनियादी मुद्दों को सामने रखकर राजनीति को ही बदल सकते है.


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