“आदिवासी धर्म” को धर्म के कोड एवम कोलम में सामिल करनेकी मांग

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इस आर्टिकल में पूरी माहिती विडियो के आधार से भी संजाई गयी है विस्तार से देखे :   आदिवासी धर्म कोड की मांग किसीभी धर्म का विरोध नहीं है और ये किसीभी आदिवासिको अपना धर्म बदलने की मांग नहीं है ये बस सभी आदिवासी के हित एवम अधिकार के लिए है

25.02.2019, नयी दिल्ली, राष्ट्रीय आदिवासी इंडीजीनियश धर्म समन्वय समिति के बैनर तले आज 25.02.19 को नयी दिल्ली स्थित जंतर-मंतर पर बड़ी संख्या में देश के 19 राज्यों के आदिवासियों के प्रतिनिधि एकत्रित हुए और सुबह 10.30 बजे से सायं 04.30 बजे तक धरना दिया गया। धरना स्थल पर प्रबुद्ध आदिवासी प्रतिनिधियों ने 2021 की जनगणना में पृथक धर्म कोड या कालम जोड़े जाने की मांग करते हुए भारतभर के आदिवासियों की ओर से केंद्र सरकार को ज्ञापन सौंपा गया।

आदिवासियों के पृथक धर्म कोड/कालम की मांग के समर्थन में गुजरात से लालुभाई वसावा, राजस्थान से मैं डॉ. पुरुषोत्तम मीणा, रूप चंद झरवाल, देवराज मीणा, ओपी मीणा, कार्तिक भील आदि अनेक साथी शामिल हुए।

जनगणना प्रपत्र में प्रकृति पूजक आदिवासियों के धर्म कोड के लिए ‘आदिवासी धरम’ धर्म कोड में सामिल करनेकी मन उठी है । इस संबंध में असम, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, गुजरात, कर्नाटक, मध्यप्रदेश समेत अन्य आदिवासी बहुल 19 राज्यों के प्रतिनिधियों देल्ही पोहचे है।

गुजरात ,पश्चिम बंगाल, असम, छत्तीसगढ़, उड़ीसा के हो, संथाल, उरांव, मुंडा और अन्य जनजातीय समुदाय के कई प्रतिनिधि उपस्थित थे।

44 लाख जैन का अलग कोड तो 12 करोड़ आदिवासियों को क्यों नहीं :
जब देश में निवास करने वाले 44 लाख जैन धर्म अनुयायियों को अलग धर्म कोड हो सकता है तो फिर पूरे देश में निवास करने वाले 12 करोड़ से अधिक प्रकृति पूजक आदिवासियों का अलग धर्म कोड क्यों नहीं हो सकता है। बस जरूरत है एकजुट होकर मांग करने को। जो मांग लोग कर चुके है ओर आदिवासी समाज के लोग बहुत मात्र में इसमें जुड़ रहेहै ।

आदिवासी हिन्दू, क्रिस्टियन या मुस्लिम नहीं पर आदिवासी है, जानिए पूरा सच विडियो देखिये

विस्तार से समज़िये

जातिके प्रमाण पत्रमे क्यों जरुरत पड़ेगी?

Dr. Bhavin Vasava

Bharuch


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