आखिर किस घोटाले में फंसे हैं राहुल गांधी के जीजा रॉबर्ट वाड्रा?

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इंट्रोडक्शन कैसे दें इनका? विरोधी इनको देश के जीजाजी कहते हैं. कांग्रेसी इन्हें कारोबारी बताते हैं. और राहुल के करीबियों के लिए ये जीजाजी हैं. दुनिया इनको प्रियंका गांधी के के पति के तौर पर जानती है. और जब किसी बड़े विवाद में इनका नाम सामने आता है तो लोग सोनिया का दामाद मानकर ‘बड़े लोग-बड़ी-बड़ी बातें’ के अंदाज में न्यूज़ देख-पढ़ लेते हैं. और भूल जाते हैं. बात चल रही है रॉबर्ट वाड्रा की. एक शख्स जो अक्सर अलग-अलग वजहों से सुर्खियों में रहता है. इन दिनों इनका नाम बीकानेर में हुए एक जमीन घोटाले को लेकर लगातार चर्चा में है. आरोप है कि रॉबर्ट वाड्रा के लोगों ने बीकानेर में एक विवादित जमीन खरीदी. फिर उसे तगड़े लाभ के साथ बेच दिया. ईडी यानी कि प्रवर्तन निदेशालय, जिसका काम ब्लैक मनी को व्हाइट करने वाले केसों की जांच करना होता है, वो भी रॉबर्ट वाड्रा से पूछताछ करना चाह रहा है. ईडी ने वाड्रा और उनसे जुड़े लोगों के दफ्तरों में छापेमारी भी की है. इसके बाद वाड्रा लगातार सुर्खियों में रहने लगे. तो हमने भी सोचा कि क्यों न आपको वो पूरा मामला ही बता दें, जिसकी वजह से ऐसी बातें हो रही हैं. जिसकी वजह से वाड्रा के ठिकानों पर छापेमारी हो रही है और जिसकी वजह से बीजेपी कांग्रेस पर हमलावर है.
राहुल गांधी-राबर्ट वाड्रा. फाइल फोटो. इंडिया टुडे.
राहुल गांधी-रॉबर्ट वाड्रा. फाइल फोटो. इंडिया टुडे.

पहले बात रॉबर्ट वाड्रा की कंपनी की

और इसके लिए चलना पड़ेगा थोड़ा पीछे. साल 2007. यानी अब से कोई 12-13 साल पहले रॉबर्ट वाड्रा एक कंपनी बनाते हैं. इस कंपनी का नाम रखा जाता है स्काइलाइट हॉस्पिटैलिटी प्राइवेट लिमिटेड. किसी भी कंपनी का रजिस्ट्रेशन होता है रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज में. तो वाड्रा की भी कंपनी रजिस्टर हुई रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज में. इसके दिल्ली ऑफिस के मुताबिक राबर्ड वाड्रा और उनकी मां मौरीन वाड्रा इस कंपनी में शुरुआत से ही डायरेक्टर यानी कर्ताधर्ता हैं. इन दिनों इस कंपनी का नाम बदलकर स्काइलाइट हॉस्पिटैलिटी लिमिटेड लायबिलिटी कर दिया गया. मतलब ये कि कंपनी का नाम बदल गया. रजिस्ट्रेशन के वक्त कंपनी मामलों के मंत्रालय को बताया गया था कि ये कंपनी रेस्टोरेंट, बार और कैंटीन चलाने जैसे काम करेगी. ये बात ध्यान में रखिएगा क्योंकि विवाद की एक वजह ये भी है.

फिर क्या हुआ?

स्काइलाइट हॉस्पिटैलिटी प्राइवेट लिमिटेड ने साल 2012-13 में कुछ दलालों के जरिए बीकानेर में पाकिस्तान बॉर्डर से सटे कोलायत क्षेत्र में 69.55 हेक्टेयर जमीन खरीदी. ईडी के मुताबिक ये जमीन उन लोगों की दी जानी थी, जिनको सेना ने महाजन फील्ड फायरिंग रेंज से विस्थापित किया था. मतलब ये कि ये जमीन महाजन फायरिंग रेंज के विस्थापितों के लिए आरक्षित थी. जमीन मूल तौर पर सेना की थी. अब खेल क्या हुआ? खेल ये हुआ कि कुछ भूमाफिया ने इस जमीन को फर्जी कागज़ात के ज़रिए अपने नाम दर्ज करा लिया. और फिर इसे वाड्रा की कंपनी स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी को बेच दिया गया.

लेकिन सवाल है कि दिक्कत क्या है? कह तो ये भी सकते हैं वाड्रा खुद ही धोखाधड़ी के शिकार हो गए. लोगों ने उनको ही चूना लगा दिया और सेना की वो ज़मीन बेच दी, जिसे कोई खरीद ही नहीं सकता था. लेकिन हुआ ये कि जब ज़मीन वाड्रा की कंपनी के नाम हो गई, तो वाड्रा की कंपनी ने भी ज़मीन अपने पास नहीं रखी और इसे दूसरे को बेच दिया. वाड्रा की कंपनी ने ये ज़मीन खरीदी थी महज़ 72 लाख रुपये में, लेकिन इसे बेचा गया 5 करोड़ 15 लाख रुपये में. इस तरह से कंपनी ने कुछ ही दिनों में 4 करोड़, 43 लाख रुपए का मुनाफा कमा लिया. वाड्रा की कंपनी ने यहां के 34 गांवों में 374.44 हेक्टेयर जमीन और खऱीदने की कोशिश की थी, लेकिन जांच में बेचने वाले ही फर्जी पाए गए. और फिर उसके बाद ये डील नहीं हो पाई, क्योंकि ज़मीन के दाखिल-खारिज पर रोक लगा दी गई.

rahul vadra
राबर्ट वाड्रा. फाइल फोटो. इंडिया टुडे.

लोकसभा-विधानसभा चुनाव में मुद्दा बने वाड्रा

वाड्रा ने कंपनी के लिए ज़मीन के सौदे किए, लेकिन ये सौदे सियासत के लिए भी मुफीद साबित हुए. 2013 में जब राजस्थान में विधानसभा चुनाव थे, तो बीजेपी ने इसे मुद्दा बना लिया. सत्ता में आने पर इन सौदों की जांच का ऐलान हुआ. मई 2014 में लोकसभा चुनाव के दौरान भी मुद्दा गरमाया. यूपीए 2 के भ्रष्टाचार के अलावा कांग्रेस के परिवार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे. तब के बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार और अब के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रॉबर्ट वाड्रा के जरिए सीधे तौर पर गांधी-नेहरू परिवार पर निशाना साधा.

भाजपा सरकार बनने पर जांच शुरू हुई

बीजेपी का निशाना सही जगह पर लगा था. 2013 में राजस्थान में जीत बीजेपी की ही हुई. 2014 में भी केंद्र में बीजेपी ही आई. लेकिन मामला राजस्थान से जुड़ा था तो ऐक्शन राज्य सरकार को ही लेना था. वसुंधरा राजे मुख्यमंत्री थीं. कहा मामले की जांच होगी. आदेश हुआ और जांच सौंपी गई स्थानीय तहसीलदार को. तहसीलदार ने रिपोर्ट में लिखा कि जमीनों का बैनामा गलत तरीके से हुआ है. अब रिपोर्ट आ गई तो केस दर्ज होना ही था. केस दर्ज हुआ 2014 में. बीकानेर के गजनेर थाने में 16 मुकदमे और कोलायत थाने में 2 मुकदमे. इनमें से 4 मुकदमे स्काइलाइट हॉस्पिटैलिटी से जुड़े हैं. तहसीलदार ने कहा कि ये ज़मीन भूमाफिया ने फर्जी दस्तावेज के सहारे अपने नाम करा ली. ऐसा करने वालों में सरकारी अफसर भी शामिल हैं. इस रिपोर्ट के बाद ही 374.44 हेक्टेयर जमीन के ट्रांसफर पर रोक लगा दी गई. उधर, राजस्थान पुलिस की एफआईआर पर ईडी ने भी संज्ञान ले लिया. ये साल था 2015. उसने केस दर्ज किया पीएमएलए के तहत. यानी प्रिवेंशन ऑफ मनी लांड्रिंग ऐक्ट. इस कानून के तहत उन लोगों पर केस होता है, जो अपनी काली कमाई को सफेद करने की कोशिश करते हैं. ईडी ने पाया कि वाड्रा ने भी ऐसी ही कोशिश की थी और इसलिए केस दर्ज कर लिया.

लेकिन क्या ये राजनीतिक आरोप भर हैं?

कांग्रेस और रॉबर्ट वाड्रा शुरुआत से ही इस पूरे केस को केंद्र और राजस्थान सरकार की साजिश बताते रहे हैं. हमेशा से कहते रहे हैं कि राजस्थान पुलिस ने सीएम वसुंधरा राजे के कहने पर केस दर्ज किया और ईडी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोगी के कहने पर. और ये केस राजनीतिक बदले की भावना से दर्ज किए गए. पर बात इतनी भर ही नहीं जान पड़ती. ईडी इस मामले में रॉबर्ट वाड्रा से पूछताछ करना चाहता है. उसने इसके लिए समन भी भेजे हैं. मगर वाड्रा इसके खिलाफ चले गए राजस्थान हाईकोर्ट और ले आए स्टे. लेकिन ये स्टे भी कब तक रहता. हाल की सूरत ये है कि स्टे हट गया है. ईडी ने फिर से रॉबर्ट वाड्रा से कहा है कि पूछताछ में हेल्प करें. लेकिन अब तक दोनों का आमना-सामना नहीं हुआ है. ईडी का कहना है कि रॉबर्ट वाड्रा की कंपनी स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी के साथ 12 और लोग हैं, जिन्होंने फर्जीवाड़ा करने वाले लोगों से ऐसी ज़मीन खरीदी, जिसे बेचा ही नहीं जा सकता था. लेकिन उन्होंने सस्ती कीमत पर ज़मीन खरीदकर महंगे में बेच दिया और तगड़ा मुनाफा कमाया. मनी लॉन्ड्रिंग के तहत ऐसा करना अपराध है.

कहानी में एक और पेच है

रॉबर्ट वाड्रा के इस सौदे में एक और पेच है. पेच ये कि वाड्रा की कंपनी ने ये जमीन जिस कंपनी को बेची उसका नाम एलजेनी फिनलीज प्राइवेट लिमिटेड है. आरोप है कि इस कंपनी ने ज़मीन को खरीदने के लिए भूषण पॉवर एंड स्टील लिमिटेड यानी बीपीएसएल से 5.64 करोड़ रुपए का लोन लिया. और बाद में भूषण पॉवर को इन्कम टैक्स में राहत दी गई. और राहत भी मामूली नहीं थी. 500 करोड़ रुपये की कमाई पर इन्कम टैक्स से राहत मिली. रकम का अंदाजा आप खुद ही लगा लीजिए. ईडी इस मामले की भी जांच कर रहा है.

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राबर्ट वाड्रा-प्रियंका गांधी. फाइल फोटो. इंडिया टुडे.

ईडी का दावा- वाड्रा की कंपनी को तजुर्बा नहीं था

ईडी के मुताबिक कंपनी के तौर पर स्काइलाइट हॉस्पिटैलिटी का रियल इस्टेट में काम करने का कोई तज़ुर्बा नहीं था. इसके कई शेयरधारक डमी के तौर पर काम करते पाए गए हैं. ईडी अब तक स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी की 1.18 करोड़ रुपए की प्रॉपर्टी जब्त कर चुका है. वाड्रा को पूछताछ के लिए 3 बार समन भेज चुका है. वाड्रा हर बार समन को टालते गए हैं. और अब तक हुआ ये है कि ईडी उस ज़मीन को अपने कब्जे में ले चुका है, जिसको लेकर पूरा विवाद है. इस ज़मीन में कोलायत बस स्टैंड के पास की ज़मीन और दुकानें शामिल हैं. अब इस ज़मीन पर ईडी का बोर्ड लगा है. सरकारी संपत्ति का हवाला दिया गया है. जयप्रकाश बांगड़वा नाम के एक शख्स को पुलिस गिरफ्तार कर चुकी है. बताया है कि यही वो आदमी है, जिसने ज़मीन की दलाली की थी. फर्जी दस्तावेज के जरिए करोड़ों की ज़मीन बेचने के आरोप में ईडी ने उसकी कई संपत्तियां ज़ब्त की हैं. रॉबर्ट वाड्रा के कथित सहयोगी और स्काइलाइट हॉस्पिटैलिटी से जुड़े महेश नागर नाम के शख्स के भी कई ठिकानों पर छापेमारी हुई है. कुछ मीडिया रिपोर्ट्स कहती हैं कि महेश नागर फरीदाबाद में तिगांव से कांग्रेस विधायक ललित नागर का भाई है और रॉबर्ट वाड्रा का प्रतिनिधि है. कहा जाता है कि ज्यादातर ज़मीनों के सौदे इसी के जरिए हुए हैं. दिसंबर, 2018 में ईडी ने नागर के करीबी सहयोगी अशोक कुमार और जयप्रकाश भार्गव को गिरफ्तार किया था. ईडी ने कहा था कि अशोक कुमार इन सौदों में महेश नागर का मुख्य सहयोगी था.

और अब आगे क्या?

अब फिर से लोकसभा के चुनाव हैं. 2019 का साल चल रहा है. चुनावी तैयारी भी चल रही है. और इसी तैयारी के बीच कांग्रेस ने रॉबर्ट वाड्रा की पत्नी और सोनिया गांधी की बेटी प्रियंका गांधी वाड्रा को कांग्रेस का महासचिव बना दिया है. अब तक बीजेपी वाड्रा के जरिए कांग्रेस पर हमला बोलती थी, अब उसके पास मौका है प्रियंका पर हमला बोलने का. और ये मौका खुद कांग्रेस ने दिया है.


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