सरकार चुनाव के समय याद आया लोकपाल क्यों?

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सरकार ने लोकपाल नियुक्त करने का फैसला किया है. जानिए इसके पीछे सरकार की मंशा क्या है और लोकपाल संस्था से जुड़े क़ानूनी प्रावधान क्या हैं?

लोकपाल क़ानून बनने के पांच साल बाद देश को पहला लोकपाल मिलने की चर्चा है. ख़बर है कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज पिनाकी चंद्र घोष जल्द ही लोकपाल नियुक्त होंगे.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्य न्याधीष रंजन गोगोई, लोक सभा स्पीकर सुमित्रा महाजन और वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी की सदस्यता वाली समिति ने पिनाकी चंद्र घोष का नाम तय किया है. हालांकि बतौर विशेष आमंत्रित सदस्य बुलाए गए कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने इस बैठक में हिस्सा नहीं लिया. खड़गे ने नेता विपक्ष के बजाए स्पेशल इनवाइटी के तौर पर बैठक में आमंत्रित किए जाने पर एतराज जताया था.

संसद ने लोकपाल औऱ लोकायुक्त क़ानून 2013 में पारित किया. 1 जनवरी, 2014 को इस क़ानून को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिली. 16 जनवरी, 2014 को लोकपाल क़ानून की अधिसूचना जारी कर दी गई

इस क़ानून के तहत केंद्र में भ्रष्टाचार के मामलों की जांच के लिए लोकपाल और सभी राज्यों के लिए लोकायुक्त की नियुक्ति का प्रावधान किया गया है. इसकी जांच के दायरे में सरकारी कर्मचारियों के अलावा तमाम जनप्रतिनिधि भी रखे गए हैं.

इस क़ानून के मुताबिक़ लोकपाल के पद पर नियुक्ति के लिए भारत का मुख्य न्यायाधीश या पूर्व मुख्य न्यायाधीश या सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश या पूर्व न्यायाधीश होना ज़रुरी है. हालांकि इस पद पर ऐसी किसी प्रसिद्ध शख्सियत भी नियुक्ति भी की जा सकती है जिसे भ्रष्टाचार रोधी नीतियां बनाने, लोक प्रशासन, सतर्कता, वित्त, बीमा, या बैंकिंग कानून या फिर प्रबंधन के क्षेत्र में 25 वर्ष का अनुभव हो.

लोकपाल कानून के तहत इस संस्था में अधिकतम आठ सदस्य हो सकते हैं. इनमे से आधे न्यायिक पृष्ठभूमि से होने चाहिए. इसके अलावा कम से कम आधे सदस्यों का अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़ी जाति, अल्पसंख्यक और महिला होना ज़रूरी है.

लोकपाल का वेतन और भत्ते सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश के समान ही तय किए गए हैं. जबकि बाक़ी सदस्यों को सुप्रीम कोर्ट के जज जितना वेतन दिया जाना है. हालांकि अगर लोकपाल या सदस्य को किसी अन्य विभाग से पेंशन मिल रही है तो उतनी राशि वेतन से कम कर दी जाएगी.

कुछ मामलों में लोकपाल के पास दीवानी अदालत के अधिकार दिए गए हैं. लोकपाल के पास केंद्र या राज्य सरकार के अधिकारियों की सेवा का इस्तेमाल करने का भी अधिकार है. भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में संपति को अस्थाई तौर पर नत्थी यानि अटैच करने का अधिकार है. लोकपाल विशेष परिस्थितियों में भ्रष्ट तरीक़े से कमाई गई संपति, आय, प्राप्तियों या फ़ायदों को ज़ब्त कर सकता है. भ्रष्टाचार के आरोपी सरकारी कर्मचारी के स्थानांतरण या निलंबन की सिफ़ारिश कर सकता है. केंद्र सरकार को भ्रष्टाचार के मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतों के गठन का प्रावधान भी कर सकता है.

बहरहाल, 2014 के आम चुनाव में भ्रष्टाचार एक अहम मुद्दा था. लोकपाल क़ानून 2014 से पहले बन चुका था. लेकिन सरकार ने लोकपाल नियुक्त करने में पांच साल लगा दिए. चुनाव की अधिसूचना जारी करने होने के बाद इस तरह की नियुक्ति पर तमाम तरह के सवाल भी हैं

विपक्ष का आरोप है लोकपाल की नियुक्ति जान-बूझकर नहीं की गई थी. अगर लोकपाल नियुक्त हो जाता तो बीजेपी सरकार के तमाम भ्रष्टाचार खुलकर सामने आ जाते. आरोप ये भी है कि ये अंतिम समय में संस्थाओँ में अपने लोगों की नियुक्ति की कोशिश है. ये भी कहा जा रहा है कि रफ़ाल मुद्दे पर घिरी सरकार इस नियुक्ति के ज़रिए भ्रष्टाचार के दाग़ छिपाने की कोशिश कर रही है.

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