BJP: CM: जो 5 बार विधायक – MLA रहे रघुबर दास हारे क्यू ? BJP के 4 मंत्री भी हारे – सरकार से आदिवासी नाराज

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झारखंड विधानसभा चुनावों में बीजेपी (BJP) को जहां हार का सामना करना पड़ा वहीं जेएमएम (JVM) की अगुवाई वाली गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिला है.

रांची. झारखंड विधानसभा चुनाव (Jharkhand Assembly Election) में बीजेपी सरकार के मुखिया रघुवर दास (Raghubar Das) समेत 4 मंत्री हार गए हैं. बता दें कि झारखंड विधानसभा की 81 सीटों पर हुए चुनाव के बाद सोमवार को वोटों की गिनती जारी है. अब तक के रुझानों/परिणामों में 47 सीटों पर जेएमएम-कांग्रेस-आरजेडी गठबंधन,  25 पर बीजेपी (BJP), 3 पर जेवीएम (JVM), 2 पर आजसू (AJSU) और 4 पर अन्य आगे चल रहे हैं.

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जमशेदपुर पूर्वी से हारे CM रघुवर दास
झारखंड के जमशेदपुर पूर्वी सीट से बीजेपी उम्मीदवार और राज्य के कार्यवाहक मुख्यमंत्री रघुवर दास चुनाव हार गए हैं. उन्हें पूर्व मंत्री और निर्दलीय प्रत्याशी सरयू राय ने 15 हजार से ज्यादा मतों से हराया. मुख्यमंत्री रघुवर दास साल 1995 से लगातार पांच बार विधायक रह चुके हैं. इससे पहले वह एक भी चुनाव नहीं हारे थे.

दुमका से मंत्री डॉ. लुईस मरांडी हारीं

दुमका विधानसभा सीट से जेएमएम प्रत्याशी हेमंत सोरेन ने 13188 मतों के अंतर से जीत दर्ज की. उन्होंने बीजेपी प्रत्याशी और झारखंड की मौजूदा समाज कल्याण मंत्री लुईस मरांडी को हराया.

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सिसई से विधानसभा स्पीकर दिनेश उरांव हारे
दुमका विधानसभा सीट से झारखंड  के जिग्‍गा सुसारन होरा ने झारखंड विधानसभा के दिनेश उरांव को हराया.मधुपुर से मंत्री राज पलिवार हारे
मधुपुर विधानसभा सीट से रघुवर सरकार के श्रम मंत्री राज पलिवार चुनाव हार गए हैं. जेएमएम के हाजी हुसैन अंसारी ने यहां से जीत दर्ज की.

इन मंत्रियों ने बचाई अपनी सीट

खूंटी विधानसभा सीट से मंत्री नीलकंठ सिंह मुंडा, चंदनकियारी सीट से मंत्री अमर बाउरी, सारठ सीट से मंत्री रणधीर सिंह जीते और रांची से मंत्री सीपी सिंह ने जीत दर्ज की.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने झारखंड विधानसभा चुनाव (Jharkhand Assembly Elections) में झारखंड मुक्ति मोर्चा (Jharkhand Mukti Morcha) कांग्रेस (Congress) और आरजेडी (RJD) के महागठबंधन की जीत के बाद ट्वीट किया कि उनकी पार्टी राज्य की सेवा करती रहेगी और जनकेंद्रित मुद्दे उठाती रहेगी.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने सोमवार को झारखंड मुक्ति मोर्चा (Jharkhand Mukti Morcha) के नेता हेमंत सोरेन को राज्य विधानसभा चुनाव (State Assembly Elections) में जीत के लिए बधाई दी तथा विजयी गठबंधन को राज्य की सेवा के लिए शुभकामनाएं दीं. सोरेन के नेतृत्व वाली झामुमो और कांग्रेस (Congress) का गठबंधन राज्य विधानसभा चुनाव में जीतता दिखाई दे रहा है.

पीएम मोदी ने ट्वीट किया कि उनकी पार्टी राज्य की सेवा करती रहेगी और जनकेंद्रित मुद्दे उठाती रहेगी. प्रधानमंत्री ने कहा, ‘हेमंत सोरेन और झामुमो नीत गठबंधन को झारखंड चुनाव में जीत के लिए बधाई. उन्हें राज्य की सेवा करने के लिए शुभकामनाएं.’

1. भाजपा का वोट शेयर लोकसभा चुनाव में 51% था, विधानसभा चुनाव में 33% रह गया
7 महीने पहले मई 2019 में जब लोकसभा चुनाव के नतीजे आए थे, तो भाजपा ने 51% वोट हासिल कर 54 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त बनाई थी। 35 विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा की लीड 50 हजार से अधिक थी। इनमें 16 विधानसभा क्षेत्रों में लीड मार्जिन 90 हजार से ज्यादा था। भाजपा ने राज्य की 14 में से 11 लोकसभा सीटें भी जीती थीं। आजसू भी उसके साथ जिसे 1 सीट मिली थी। इसी वजह से भाजपा को झारखंड में सत्ता में वापसी की उम्मीद थी। झारखंड का ट्रेंड भी बताता है कि लोकसभा चुनाव की तुलना में विधानसभा चुनाव में भाजपा का वोट शेयर लगभग 10% गिरता है। इस हिसाब से भाजपा का वोट शेयर 51% से घटकर 41% पर टिकता, तो भी वह सत्ता में वापसी कर लेती। लेकिन कुर्मी-कोयरी समेत पिछड़े और दलितों के बीच ठीक-ठाक आधार रखने वाली सहयोगी पार्टी आजसू उससे छिटक गई। उसे चुनाव में 8% वोट मिले। नतीजा यह हुआ कि भाजपा का वोट शेयर भी अनुमानित 41% से 8 फीसदी और कम होकर 33% पर रह गया। 

2. रघुवर दास की जमीन खिसकी
राज्य में पिछड़ा बहुल 26 विधानसभा क्षेत्रों से भाजपा को सत्ता हासिल होती थी, वहां उसे सबसे ज्यादा घाटा हुआ। जमशेदपुर पूर्वी में अवैध 86 बस्तियों को नियमित बनाने का सवाल ऐसा तना कि मुख्यमंत्री रघुवर दास का आधार ही खिसक गया। वे इन बस्तियों को नियमित नहीं कर पाए। नतीजा यह हुआ कि वे जमशेदपुर पूर्वी सीट पर अपनी ही सरकार में कभी मंत्री रहे सरयू राय से पिछड़ गए। उधर, भाजपा के लक्ष्मण गिलुआ भी चक्रधरपुर में तीसरे स्थान पर खिसक गए। 

3. भाजपा सरकार से आदिवासी नाराज हुए
जल-जंगल-जमीन के सवाल पर आदिवासी सरकार से नाराज थे। राज्य में उद्योगों के लिए लैंड बैंक बनाए जा रहे थे। आदिवासी इस जमीन को अपना मानते थे। छोटा नागपुर टेनेंसी एक्ट और संथाल परगना टेनेंसी एक्ट में सरकार ने संशोधन की कोशिश की थी। आदिवासी मान रहे थे कि उनकी जमीन उद्योगों को देने के लिए यह कोशिश हो रही है। भारी विरोध के चलते इन कानूनों में संशोधन तो नहीं हुआ, लेकिन आदिवासियों की नाराजगी बढ़ गई। अनुसूचित जनजाति के लिए सुरक्षित 28 सीटों में 20 झामुमो-कांग्रेस गठजोड़ के खाते में गईं। भाजपा को यहां 5 सीटों का सीधा नुकसान हुआ। सत्ता में रहते हुए पारा शिक्षकों, आंगनबाड़ी सेविका-सहायिका की नाराजगी केंद्रीय योजनाओं के बूते हुए विकास के काम पर कुछ ऐसी भारी पड़ती दिखी कि प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री की डबल इंजन की सरकार की गुहार काम नहीं आई। 

भाजपा का फोकस केंद्र की योजना पर ही रहा
भाजपा ने पूरे चुनाव में केंद्रीय योजनाओं की डिलिवरी जैसे आयुष्मान भारत, उज्ज्वला योजना, किसान सम्मान राशि का प्रचार किया था। प्रधानमंत्री ने अपनी कुछ फ्लैगशिप योजनाओं को भी झारखंड से ही लॉन्च किया था। राम मंदिर, नागरिकता कानून जैसे मसले उठाए। इनमें कहीं भी स्थानीय लोगों से जुड़े सवाल नहीं थे। शिक्षकों, आंगनबाड़ी सेविकाओं के मुद्दों पर उनहोंने बात नहीं की। 

4. महागठबंधन पहले से तैयार था, चुनाव घोषित होते ही भाजपा से दूर हुई आजसू
झामुमो-कांग्रेस-राजद गठजोड़ ने चुनाव घोषणा से पहले ही सीटों का बंटवारा कर जमीन पर कवायद शुरू कर दी थी। वहीं, भाजपा-आजसू गठजोड़ चुनाव घोषणा के बाद टूटा। आजसू पिछले 5 साल भाजपा के साथ सत्ता में थी। सीटों के बंटवारे के सवाल पर भाजपा ने पुराने सहयोगी आजसू पार्टी को खोया। भाजपा ने मंत्री सरयू राय का टिकट काट दिया। दूसरे दलों से आए नेताओं को भी टिकट दिए गए। ये दोनों ऐसी चूक थीं, जो चुनावी हवा का रुख भाजपा के खिलाफ करने में मददगार साबित हुईं।

5. महागठबंधन ने गुरिल्ला प्रचार शैली अपनाई, बड़ी रैलियां नहीं कीं
भाजपा के बड़े नेताओं की कारपेट बॉम्बिंग शैली में किए गए प्रचार के उलट गठबंधन के नेताओं ने प्रचार की गुरिल्ला शैली अपनाई। बड़ी सभाएं नहीं कीं। सुदूर इलाकों में कई-कई बार हेलिकॉप्टर से उतरे। अलग-अलग प्रचार किए। मौका देख मंच साझा किया। उनकी रणनीति कामयाब रही।

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