2019 में गुजरात में एक नया आदिवासी – दलित आंदोलन भाजपा की परेशानियां बढ़ा सकता है

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गुजरात में अनुसूचित जाति (एससी) और जनजाति (एसटी) को मिलने वाले विशेष बजट के उचित निर्धारण और उसके पारदर्शी उपयोग के लिए कानून की मांग हो रही है

पिछले दो महीनों से गुजरात में एक नए दलित-आदिवासी आंदोलन की सुगबुगाहट है. वजह है राज्य सरकार की तरफ से अनुसूचित जाति (एससी) और जनजाति (एसटी) को मिलने वाले विशेष बजट के उचित निर्धारण और उसके पारदर्शी उपयोग के लिए सांवैधानिक नियमन की मांग. गुजरात के एक विधायक विधानसभा में प्राइवेट बिल पेश कर इस दिशा में उचित कानून बनाने की मांग रखी है, ताकि प्रदेश सरकार एससी और एसटी को मिलने वाले फंड का इस्तेमाल अन्य क्षेत्रों में कर उनका हक़ न मार सके.

दलित समुदाय से ताल्लुक रखते सभी विधायक साथमे जुदानेका सोच रहे है. विधानसभा में इस आदिवासी समाज के समर्थन देने के लिए सभी अनुसूचित जाति और जनजाति समुदायों से ताल्लुक रखने वाले प्रदेश के सभी विधायकों को एक बैठक के लिए आमंत्रित किया जा सकता है. लेकिन भाजपा के विधायकों को इस बैठक में भाग लेने दिया जायेगा या नहीं ?


कुछ समय पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भाजपा सांसदों से कहा था कि वे दलित-बहुल गांवों में जाएं और वहां कम से कम दो रातें बिताएं. प्रधानमंत्री ने सांसदों से लोगों को यह याद दिलाने की अपील की कि भाजपा ही वह पार्टी है जिसने दलितों के कल्याण के लिए काम किया, जबकि अन्य दलों का दलित प्रेम केवल भाषणों तक सीमित रहा. प्रधानमंत्री यह भी कहते रहे हैं कि भाजपा दलितों और आदिवासियों की महत्वाकांक्षाओं के साथ खड़ी है. लेकिन एससी-एसटी को मिलने वाले विशेष बजट के सही इस्तेमाल के लिए कानून बनाने को लेकर गुजरात में प्रधानमंत्री की पार्टी का रुख उनके दावों से मेल नहीं खाता.

इस बिल का आधार क्या है?

विश्लेषक बताते हैं कि 1980 में इंदिरा गांधी सरकार के समय स्पेशल कंपोनेंट प्लान एंड ट्राइबल सबप्लान नाम की योजना बनाई गई थी. इसे बाद में शेड्यूल कास्ट सबप्लान एंड ट्राइबल सबप्लान (एससीएसपी एंड टीएसपी) नाम से जाना गया. इस योजना के तहत सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों द्वारा उनके कुल वार्षिक बजट के एक तय हिस्से को अनुसूचित जातियों और जनजातियों के विकास के लिए विभिन्न क्षेत्रों (जैसे- शिक्षा, स्वास्थ्य आदि) में खर्च करने की बात कही गई थी. इसके लिए योजना आयोग की तरफ से दिशानिर्देश भी ज़ारी किए गए. इन निर्देशों के मुताबिक किसी राज्य/केंद्रशासित प्रदेश के कुल बजट का बंटवारा- वहां की कुल आबादी की तुलना में वहां की अनुसूचित जाति या जनजाति की आबादी के अनुपात- के बराबर किया जाना तय हुआ. यानी किसी राज्य में एससी/एसटी की आबादी पांच-पांच फीसदी है तो उस राज्य के कुल बजट का पांच-पांच फीसदी हिस्सा इन दोनों तबकों के हितों में उपयोग में लिया जाना चाहिए.

लेकिन ये निर्देश देशभर में एकसार लागू नहीं किए जा सके. अलग-अलग राज्यों ने इन्हें अपने हिसाब से संशोधित कर अलग-अलग रूप में अपनाया. एक तरफ आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तेलांगाना जैसे राज्यों ने दलितों और आदिवासियों के हितों को ध्यान में रखते हुए इस योजना को कानून की शक्ल दी तो दूसरी तरफ देश के अन्य राज्यों की तरह गुजरात में भी धड़ल्ले से इस बजट का इस्तेमाल सरकारों के मनमाफ़िक कामों में किया गया.

गुजरात में इस कानून की जरूरत क्यों महसूस होती है?

गुजरात में इस कानून की जरूरत पर बात करते हुए ऐ आपको बताते है की गुजरात सरकार के 2018-19 के बजट का उदहारण देते हैं. कहते हैं, ‘इस बार सूबे का कुल बजट 1,83,666 करोड़ रुपए है. नीति आयोग के निर्देशों के मुताबिक प्रदेश के दलितों को उनकी सात फीसदी आबादी के हिसाब से करीब 12,800 करोड़ रुपए मिलने चाहिए. लेकिन उन्हें आवंटित हुए महज (करीब) 4,500 करोड़ रुपए. इसी तरह जनजातियों की 13 फीसदी की आबादी के लिहाज से उन्हें मिलने चाहिए थे तकरीबन 23,800 करोड़ रुपए. लेकिन दिए गए सिर्फ 13,000 करोड़.’ जानकारी के  अनुसार गुजरात में अनुसूचित जाति/जनजाति सबप्लान कानून के लागू होने के बाद पहला बड़ा फायदा यह होगा कि प्रदेश सरकार चाहकर भी इन समुदायों को मिलने वाले फंड में रत्तीभर भी कटौती नहीं कर पाएगी.

मौजूदा बजट को आधार मानकर जानकारों के अनुमान लगाते हैं कि पिछले दस सालों में गुजरात में करीब चालीस हजार करोड़ रुपए दलितों और तकरीबन दस लाख करोड़ रुपए आदिवासियों के नाम पर आवंटित किए जा चुके हैं. लेकिन जमीनी हक़ीकत इस बात का सबूत है कि एससी/एसटी सबप्लान कानून के अभाव में इस राशि का न के बराबर हिस्सा सीधे तौर पर इन समुदायों के विकास लिए उपयोग में लाया गया है.

कानून के अभाव में दलित/आदिवासियों को कटौती के बाद मिली राशि का भी न्यायोचित इस्तेमाल नहीं होता

इस बारे में चर्चा करते हुए प्रदेश के वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता का कहना है, ‘एससी-एसटी फंड का जितना दुरुपयोग पिछले कई सालों में गुजरात की सरकारों ने किया है उतना शायद ही कहीं हुआ हो.’

इसकी बानगी के तौर पर पटेल प्रदेश के सूचना एवं जनसंचार विभाग का उदाहरण देते हैं. सूचना के अधिकार के तहत 2015 के बाद से मिली विभिन्न जानकारियों के आधार पर उनका कहना है, ‘2017 के गुजरात विधानसभा चुनावों में मोदी जी की सक्रियता दिखाने के लिए विज्ञापनों में एससी/एसटी फंड से एक करोड़ पैंसठ लाख रुपए खर्च कर दिए गए.’ पटेल प्रधानमंत्री मोदी के गृहजिले- वड़नगर पर बनी एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म के निर्माण में दलित-आदिवासियों के हक़ के चार लाख रुपए खर्च किए जाने का भी आरोप लगाते हैं.

ऐसे कुछ और उदाहरण देते हुए पटेल बताते हैं, ‘गुजरात सरकार की छवि चमकाने के लिए टीवी, अखबारों में चलाई जाने वाली विज्ञापन श्रृंखलाओं पर प्रतिवर्ष खर्च किए जाने वाले पांच करोड़ रुपए दलित और आदिवासियों के ही हिस्से के होते हैं.’ वे आगे जोड़ते हैं, ‘स्टेच्यू ऑफ सरदार पटेल से जुड़े विज्ञापनों को भी इसी बजट के एक करोड़ पैंतालीस लाख रुपए की बदौलत प्रसारित किया गया.’

गुजरात के चर्चित पाटीदार आरक्षण आंदोलन की याद करते हुए कहते हैं, ‘रूठे पाटीदारों को मनाने के लिए प्रदेश की भाजपा सरकार ने एक हजार करोड़ रु की योजनाएं बनाईं. इस बात के प्रचार-प्रसार के लिए जो तीन लाख पर्चे छपे, उनकी लागत में लगे 7,44,841 रुपए दलित कोष से लिए गए थे.’ नाराज पटेल का कहना है कि सरकार की यह कारस्तानी दलितों और आदिवासियों के मुंह से उनका निवाला छीनने जैसी है.

पास ऐसे खर्चों की एक लंबी फेहरिस्त है जिनसे दलित और आदिवासियों का सीधा सरोकार न होने के बावजूद इनमें उनके फंड का इस्तेमाल किया गया. इसके आंकड़े नीचे दी गई सूची में दर्ज हैं.

अलग-अलग आरटीआई के हवाले से वालजी भाई पटेल द्वारा दी गई जानकारी पर आधारि

बड़ी कारस्तानियां

गुजरात में अनुसूचित जाति और जनजाति को मिलने वाली राशि को प्रदेश सरकार किस चतुराई से दूसरी तरह से उपयोग में लेती है, इस बारे में विस्तार से बताते हैं. सड़क और भवन निर्माण विभाग का उदाहरण देते हुए वे कहते हैं, ‘इस विभाग को एससी/एसटी के विकास के लिए लगभग छह सौ करोड़ रुपए मिलते हैं. लेकिन इनमें से एक भी पैसा ऐसा नहीं है जो विशुद्ध रूप से दलित/आदिवासियों के काम आया हो.’

इसी तरह सिंचाई विभाग का भी उदहारण देते हैं. वे कहते हैं, ‘यदि किसी गांव में ढाई सौ दलित/आदिवासी भी रहते हैं तो उस इलाके में नहरें और छोटे-मोटे बांध उन्हीं के फंड से बनाए जाते हैं.’ बनासकांठा जिले में बने बांध के निर्माण में दलित/आदिवासियों के एक करोड़ इक्यावन लाख रुपयों का इस्तेमाल ऐसी ही एक बानगी है.

जानकारी के मुताबिक कहते हैं, ‘नीति आयोग ने बहुत सोच-समझकर अनुसूचित जाति/जनजातियों के बजट को सामान्य बजट से अलग रखने के निर्देश दिए थे ताकि इन समुदायों को मिलने वाली राशि यथोचित इन्हीं के उत्थान के लिए उपयोग में लाई जा सके. लेकिन जब कोई सरकार तकरीबन इस पूरे बजट का इस्तेमाल सामान्य बजट के अधीन पूर्ण होने वाले उद्देश्यों में ही करने लगे तो फिर नीति आयोग के निर्देशों का औचित्य क्या रहेगा? पिछले सिर्फ दस वर्षों की बात करें तो इस दौरान आवंटित हुए कई लाख करोड़ रुपयों को यदि ईमानदारी से कुछ लाख दलित/आदिवासियों के बच्चों को शिक्षित करने, रोजगार देने, उनके स्वास्थ्य पर या फिर उनके रहवास के लिए खर्च किया जाता तो क्या ये लोग आज तक पिछड़े रह पाते?’

जानकार  कहते हैं कि सरकार ने तमाम योजनाओं के साथ ‘अंबेडकर और वन/पर्यावरण’ नाम जोड़कर दलित व आदिवासियों के हिस्से की रकम को हड़पने का खास तरीका इख़्तियार कर लिया है. जैसे- अस्पतालों में एक्सरे या अन्य मशीनें या फिर बेंच और वॉटर कूलर तक लगाते समय कहा जाता है कि चूंकि इनसे बीमार-परेशान दलित/आदिवासियों को बड़ी राहत मिलती है इसलिए इन उद्देश्यों में उनके फंड का पैसा लिया जा सकता है जो कि सरासर गलत है. उन के शब्दों में ‘इस तरह की वस्तुओं या प्रोजेक्टों पर नाम अंबेडकर का होता है और विज्ञापन मोदी जी का.’

वह कहते हैं कि गुजरात सरकार ने तीन साल पहले प्रदेश में बीस समरस छात्रावासों की नींव रखी थी. इनमें से दस छात्रों के लिए थे और दस छात्राओं के लिए. सरकार ने प्रचार किया कि दलित और आदिवासी छात्र-छात्राओं को मुख्यधारा के तौर-तरीकों से अवगत करवाने के लिए उन्हें इन छात्रावासों में दूसरे समुदायों के बच्चों के साथ रखा जाएगा. सोलंकी बताते हैं, ‘इस दलील को आधार बनाकर इन होटलनुमा छात्रावासों के निर्माण में अनुसूचित जाति के फंड से करीब छह सौ करोड़ रुपए लिए गए. लेकिन बाद में पता चला कि इन छात्रावासों में पूरा पैसा दलितों का ही लगा होने के बावजूद यहां उनके बच्चों के लिए पंद्रह फीसदी ही सीटें आरक्षित रखी गईं जिनमें आदिवासी बच्चों का भी हिस्सा शामिल है.’

क्यों गुजरात सरकार इस बारे में कुछ नहीं करती

प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार चंदू भाई महरिया का मानना है कि पूरे प्रदेश में बिखरे होने की वजह से दलित निर्णायक भूमिका में नहीं आ पाते हैं इसलिए सरकार को भी उनकी फ़िक्र नहीं है. वे कहते हैं, ‘उत्तरप्रदेश या पंजाब जैसे राज्यों में सरकार दलितों की तरफ से आंखें नहीं फेर सकती क्योंकि वे वहां राजनैतिक समीकरण बनाने और बिगाड़ने की स्थिति में हैं. लेकिन गुजरात में ऐसा नहीं है.’

गुजरात लोक सेवा आयोग के पूर्व सदस्य मूलचंद राणा, महरिया से सहमति जताते हैं. वे कहते हैं, ‘प्रदेश के मौजूदा मुख्यमंत्री विजय रूपाणी निजी बातचीतों में कई बार यह इशारा दे चुके हैं कि सात प्रतिशत दलितों के साथ होने या न होने से सूबे में भारतीय जनता पार्टी को कुछ खास फ़र्क नहीं पड़ता.’ मूलचंद राणा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के समरसता मंच की प्रदेश इकाई में भी लंबे समय तक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाल चुके हैं.

गुजरात सरकार से यह कानून बनाने की सिफारिश पहले भी की जा चुकी है

मूलचंद राणा बताते हैं, ‘वर्ष 2016 में हमने भी गुजरात में एससी/एसटी सबप्लान कानून को लागू करने के लिए आरएसएस की तरफ से विजय भाई रूपाणी से मुलाकात की थी. लेकिन उन्होंने दो टूक कह दिया कि जिन राज्यों में यह कानून लागू हुआ वहां भाजपा की सरकार नहीं थी, इसलिए हम इसे गुजरात में लागू नहीं कर सकते.’ बकौल राणा उन्होंने सरकार को चेतावनी भी दी कि यदि यह कानून नहीं बनाया गया तो वे नागपुर से लेकर दिल्ली तक आंदोलन करेंगे, लेकिन तब भी उसके कान पर जूं नहीं रेंगी. गुजरात में दलितों के प्रति भाजपा सरकार की बेरुख़ी से आक्रोशित राणा ने जीवन के 48 वर्ष आरएसएस को देने के बाद उससे नाता तोड़ दिया.

भारत सरकार के पूर्व सचिव रह चुके पी एस कृष्णन बताते हैं कि देश के अन्य राज्यों की तरह उन्होंने गुजरात सरकार से भी सिफारिश की थी कि वहां इस दिशा में उचित कानून बनाया जाए ताकि दलित और आदिवासियों के जीवन स्तर को सुधारने में मदद मिले. लेकिन वहां से सिवाय आश्वासन के कुछ नहीं मिला. इसके लिए कृष्णन ने एक ड्राफ्ट भी तैयार कर प्रदेश सरकार को सौंपा था जिस पर कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली. बता दें कि रिपोर्ट में ऊपर जिस स्पेशल कंपोनेंट प्लान एंड ट्राइबल सबप्लान (1980) का जिक्र किया गया है उसका ड्राफ्ट 1978 में कृष्णन ने ही तैयार किया था. कृष्णन कहते हैं कि सरकारों ने नीति आयोग के निर्देशों को सिर्फ आंकड़ों का खेल बनाकर रख दिया है और कुछ नहीं.

आगे क्या?

जानकार कहते हैं, ‘सामान्य कार्यकाल के हिसाब से इस बिल पर विधानसभा में अगले साल बहस होगी. लेकिन हमारी मांग है कि छह दिसंबर को यानी बाबा साहब अंबेडकर के निर्वाण दिवस पर सरकार विशेष सेशन बुलाकर यह कानून पारित कर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दे.’ इस दिशा में सरकार पर दवाब बनाने के लिए प्रदेशभर के दलित/आदिवासियों से मिलकर एक व्यापक अभियान चला रहे हैं. वे कहते हैं, ‘सरकार चाहती है कि अभावों से तंग आकर दलित सड़कों पर उतरकर हिंसा करे ताकि स्वर्ण वोट बैंक का ध्रुवीकरण किया जा सके. लेकिन हम ऐसा नहीं होने दे सकते. हमारा मकसद विरोध करना नहीं बल्कि लोगों को जागरुक करना है. लेकिन सरकार ने यदि हमारी बातें नहीं मानीं तो हम एक प्रदेशव्यापी मुहिम छेड़ेंगे.’

चंदू लाल महरिया का इस बारे में कहना है कि यदि भाजपा इस बिल से सहमत होती तो जब सोलंकी ने सभी दलित विधायकों की बैठक बुलाई थी तब उसके विधायक भी इस बैठक में पहुंचने चाहिए थे. लेकिन उनका इस बैठक से नदारद रहना पार्टी के रुख को स्पष्ट करता है. प्रदेश के वन और जनजाति मंत्री गनपत बसावा और सामाजिक न्याय व सशक्तिकरण मंत्री ईश्वर परमार पहले ही प्रेस कॉन्फ्रेंस कर उपरोक्त तमाम आरोपों को बेबुनियाद बता चुके हैं. ऐसे में राजनीतिकारों का कयास है कि अपने हक़ को पाने के लिए गुजरात के दलित व आदिवासी आने वाले कुछ महीनों में फिर से एक बड़ा आंदोलन खड़ा कर सकते हैं.


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