आदिवासियों के हितों में केंद्र से अध्यादेश लाने की मांग कितने आदिवासी नेता करेंगे?

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सुप्रीम कोर्ट का आदेस आने से यह तो पता चलता है की कि इस मामले में मोजुदा सरकार अदालत में मजबूत दलील पेश करने में बुरी तरह नाकाम रही है.

आदिवासियों को घर ख़ाली कराने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर आपत्ति जताने के लिए कितने आदिवासी नेता  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इस मुद्दे पर तत्काल अध्यादेश लाने की मांग करेंगे.? असल में वनाधिकार क़ानून के तहत जंगल में रहने के दावे को साबित नहीं कर पाने वाले लाखों आदिवासियों को सुप्रीम कोर्ट ने बेदखली का आदेश दिया है.

अगर सरकार इस मुद्दे पर अध्यादेश नहीं लाती है तो ये आदिवासियों के ख़िलाफ़ युद्ध की घोषणा जैसा होगा. ओर  केंद्र सरकार की मंशा पर भी कई सवाल उठा सकते है. आदिवासी नेता ओको केंद्र सरकार के सामने आदिवासिके  पक्ष रखने की जरुरत हे नहीतो ये उनकी नदारद साबित होसकती है ,

इस मामले में अदालत में मज़बूत दलील पेश करने में केंद्र सरकार बुरी तरह नाकाम रही. आदिवासियों के मामले को आदिवासी कल्याण मंत्रालय की जगह एक ऐसे मंत्रालय को सौंप दिया गया जो शुरू से ही वनाधिकार क़ानून के ख़िलाफ़ रहा है. इस आदेश को वनाधिकार क़ानून की भावना के ख़िलाफ़ करार दिया है. 

वनाधिकार क़ानून की धारा 4(5) में ये साफ़ तौर पर कहा गया है कि सारी प्रक्रिया को अपनाए बग़ैर किसी को भी बेदख़ल नहीं किया जा सकता. लेकिन, जिस प्राधिकरण की ज़िम्मेदारी इन प्रक्रियाओं का अनुसरण करने की है, वो ख़ुद आदिवासियों की दावेदारी को ख़ारिज करने में जुटा रहा.

42.19 लाख दावों में से सिर्फ़ 18.89 लाख दावों को ही सही माना गया, इसका मतलब 23.30 लाख आदिवासियों की ज़िंदगी झटके से बदहाली की कगार पर पहुंच गई है.

आदिवासियों के हितों की रक्षा के लिए तत्काल अध्यादेश लाना चाहिए. बीते पांच साल में केंद्र सरकार ने वनाधिकार क़ानून को कमज़ोर करने के लिए कई क़ानून पास किए. खनन अधिनियम समेत इस तरह के दूसरे क़ानूनों का भी हवाला दिया जा सकता है.


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