अनुसूचित जाति-जनजाति के लोगों का उत्पीड़न करने वालों का ‘स्वर्ग’ है गुजरात?

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जुलाई 2016 में सामने एक वीडियो क्लीप देख बहुत से लोगों की रुह कांप गई थी. इसमें दिखाया कुछ लोगों को एक गाड़ी में बांधकर बेरहमी से पीटा जा रहा है. 

उना कांड के वीडियो से बनाया गया फोटो.

यह वीडियो बनाया गया था गुजरात के उना में. जिनको पीटा जा रहा था वो दलित थे और पीटने वाले तथाकथित ऊंची जाति के लोग. इस वीडियो के सामने आने के बाद दलितों ने पूरे देश में विरोध-प्रदर्शन किया था. 

इसके कुछ ही दिन बाद राज्य की तत्कालीन मुखमुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल को हटा दिया गया था. कहा गया कि उन्हें उना कांड की वजह से हटाया गया. गुजरात के वर्तमान मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने पटेल की जगह ली थी. 

सरकार तो बदल गई लेकिन गुजरात के दलितों की स्थिति नहीं बदली. इस बात का दावा हाल में आई राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट में किया गया है. यह रिपोर्ट 2015-2017 के आंकड़ों पर आधारित है. इसके मुताबिक  2015-2017 के बीच गुजरात में अनुसूचित जाति- अनुसूचित जनजाति के लोगों पर वाली हिंसा में 46 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है.  

अनुसूचित जाति-जनजाति के लोगों का उत्पीड़न करने वालों का 'स्वर्ग' है गुजरात


 पिछले साल 2 अप्रैल को हुए भारत बंद के दौरान प्रदर्शन करते दलित समुदाय के लोग.

गुजरात में कुल जितने मामले दर्ज किए गए, उनमें से 36.3 फीसदी मामले अनुसूचित जातियों के उत्पीड़न के थे. इसी तरह पूरे देश में भी 2017 में अनुसूचित जातियों के उत्पीड़न की शिकायतें दर्ज की गईं. देश में अनुसूचित जातियों के उत्पीड़ने के 43 हजार 200 से अधिक मामले दर्ज किए गए.

इस रिपोर्ट के मुताबिक 2015 में इस तरह के 1010 मामले दर्ज किए गए थे. इस तरह के 1322 मामले 2016 में और 1477 मामले 2017 में दर्ज किए गए.

साल 2015 में अनुसूचित जातियों के उत्पीड़न के 38670 मामले दर्ज किए गए थे. एक साल बाद इस तरह के मामलों की संख्या बढ़कर 48801 हो गई.

गुजरात पुलिस के एससी-एसटी सेल के एडिशनल डीजीपी केके ओझा ने इस संबंध में अंग्रेजी अखबार ‘इंडियन एक्सप्रेस‘ से बातचीत की. उन्होंने बताया, ”एससी-एसटी एक्ट में किए गए बदलाव 2015-16 से प्रभाव में आए. इन बदलावों के बाद से उत्पीड़न के 22 और प्रकार जोड़े गए. पहले इस तरह के उत्पीड़न के 32 प्रकार ही इस कानून में थे. अब यह बढ़कर 54 हो गए हैं. यह एक बड़ा कारण है, जिसकी वजह से इस कानून के तहत दर्ज मामलों में बढ़ोतरी देखी गई है. हम यह भी सुनिश्चित करते हैं कि जाति आधारित मामलों में केस दर्ज हों. हम इसकी निगरानी करते हैं.” 

अनुसूचित जाति-जनजाति के लोगों का उत्पीड़न करने वालों का 'स्वर्ग' है गुजरात

एसीसी-एसटी एक्ट में उत्पीड़न के जो और प्रकार जोड़े गए हैं, उनमें जूते-चप्पलों की माला पहनाना, जानवरों या इंसान के शवों का निपटारा करने के लिए दबाव डालना, गटर साफ करने के लिए कहना और सार्वजनिक जगहों पर जाति का नाम लेकर गाली देना जैसे अपराध शामिल किए गए. 

एक तरफ जहां दर्ज होने वाले मामलों की संख्या बढ़ी है, वहीं दूसरी ओर अदालतों में इस तरह के लंबित मामलों की संख्या भी बढ़ी है. लेकिन इन मामलों में सजा सुनाने की दर में कमी आई है.

गुजरात की अदालतों में इस तरह के 95 फीसदी मामले लंबित हैं. इस तरह के लंबित मामलों का राष्ट्रीय औसत 91.7 फीसदी का है. 

गुजरात की अदालतों में 2016 के बाद से जातिय उत्पीड़न के 7478 मामले लंबित हैं. 2017 के अंत तक इन मामलों की संख्या बढ़कर 8827 हो गई. साल 2016 में अदालतों में भेजे गए 11 मामलों में सजा हुई, वहीं 2017 में अदालत भेजे गए केवल एक मामले में ही सजा हुई. इस दौरान कुल 411 मामलों में आरोपी बरी कर दिए गए.

अनुसूचित जाति-जनजाति के लोगों का उत्पीड़न करने वालों का 'स्वर्ग' है गुजरात

इसी तरह 2017 में जितने मामले अदालतों में भेजे गए उनमें से केवल 434 मामलों में ही सुनवाई पूरी हुई. इस तरह गुजरात में सजा सुनाने की दर केवल 2.8 फीसदी रही, जबकि इसका राष्ट्रीय औसत 35.3 फीसदी का है. गुजरात में 2016 में सजा सुनाने की दर 4.6 फीसदी थी.

इस मामले में जम्मू कश्मीर और पश्चिम बंगाल ही गुजरात से आगे हैं.  जम्मू कश्मीर में जहां किसी को सजा नहीं हुई वहीं पश्चिम बंगाल में केवल 11 मामलों में ही सुनवाई शुरू हुई.

गुजरात में अनुसूचित जाति के लोगों के उत्पीड़न के आरोप में 3470 लोगों को गिरफ्तार किया गया. इनमें 3298 पुरुष और 172 महिलाएं थीं. कुल 3693 लोगों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किए गए. इनमें 3443 पुरुष और 196 महिलाएं थीं. 

आंकड़े यह भी बताते हैं कि केवल 32 लोगों को अनुसूचित जातियों के उत्पीड़न के आरोप में सजा हुई. वहीं 1083 आरोपी बरी कर दिए गए.

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