राजस्थान / मलारना से शुरू गुर्जर आंदोलन 5 जिलों में फैला, 1 लाख यात्री फंसे

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26 ट्रेनें, 200 से अधिक रोडवेज बसें रद्द, भरतपुर, अजमेर संभाग सबसे ज्यादा प्रभावित रात 1 बजे तक सीएम गहलोत ने अधिकारियों की बैठक ली, आज सुबह फिर से बुलाया

जयपुर. सवाईमाधोपुर के मलारना डूंगर में 4 दिन पहले रेल ट्रैक से शुरू हुआ गुर्जरों का आंदोलन अब सीकर, दौसा, झुंझुनूं, बूंदी और टोंक तक फैल गया है। सोमवार को गुर्जरों ने जयपुर से जुड़ने वाले पांच सड़क मार्गों पर जाम लगाया। इसके कारण जयपुर से सवाई माधोपुर, टोंक, आगरा सहित कई इलाकों के लिए रोडवेज बसें नहीं चली। जयपुर में 200 और अजमेर में 14 रोडवेज बसों का संचालन नहीं हुआ। वहीं  26 ट्रेनें रद्द करनी पड़ी, जबकि 10 से अधिक ट्रेनों को डायवर्ट करना पड़ा। ऐसे में करीब एक लाख यात्रियों को परेशानी हुई। मांगें पूरी होने तक न तो गुर्जर आंदोलन खत्म करने को तैयार हैं न सरकार की तरफ से वार्ता के लिए कोई खास पहल हुई है। इसका सीधा असर आम जनता पर पड़ रहा है।

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मुख्यमंत्री ने बैठक की

सोमवार रात 12 बजे सीएम आवास पर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सीएस, डीजीपी, एसीएस होम, एडीजी इंटेलीजेंस व एडीजी लॉ सहित आला अफसरों की बैठक ली। इसमें गुर्जर आंदोलन की रोकथाम और समाधान पर चर्चा की गई। बैठक रात 1 बजे तक चली। सीएम ने मंगलवार को सुबह भी अधिकारियों को बुलाया है। उधर, राज्य मानवाधिकार आयोग ने आंदोलन पर चिंता जताते हुए कहा कि आमजन में भय का माहौल है। सरकार रेल और सड़क मार्ग खुलवाने के लिए उचित कार्रवाई करे। सरकार बताए कि वर्तमान में आंदोलन में शामिल लोगों पर कितने केस दर्ज हैं। इनमें से कितनों पर दंडात्मक कार्रवाई हुई। यह भी बताए कि वापस लिए गए केस दोबारा शुरू करने के लिए कोई कानून है या नहीं। बता दें कि 13 साल से चल रहे आंदोलन में 755 केस दर्ज किए गए। इनमें 233 सरकारों ने वापस ले लिए जबकि 162 में पुलिस ने एफआर लगा दी। वहीं प्रकरणों ने आरोपियों की संख्या 8550 थी।

उत्तर प्रदेश-मध्य प्रदेश से अतरिक्त सुरक्षा बल मंगाया
प्रशासन ने भरतपुर, करौली, सवाई माधोपुर, दौसा और टोंक में सुरक्षा बढ़ा दी है। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश से अतिरिक्त सुरक्षा बल मंगवाया गया है। 8 जिलों में राजस्थान सशस्त्र बल की 17 कंपनियों की तैनात की गईं। रेलवे स्टेशन और ट्रैक की भी सुरक्षा की जा रही है।

आंदोलन तेज करने की चेतावनी
गुर्जर आरक्षण आंदोलन संघर्ष समिति के प्रदेश उपाध्यक्ष भूरा भगत ने कहा, “सरकार का प्रतिनिधिमंडल सकारात्मक जवाब देने की बात कह कर गया था, लेकिन अब तक कोई संदेश नहीं आया। ऐसे में अब गुर्जर समाज को अपना आंदोलन तेज करना होगा।” इस बीच सरकार ने सरकार ने पर्यटन मंत्री विश्वेंद्र सिंह, स्वास्थ्य मंत्री रघु शर्मा और सामाजिक न्याय विभाग मंत्री भंवरलाल मेघवाल की कमेटी बनाई है।

मांग पर अड़े गुर्जर

  • गुर्जर समाज की मांग है कि सरकार सभी प्रक्रिया पूरी करके पांच प्रतिशत आरक्षण बैकलॉग के साथ दे।
  • 24 सितंबर 2015 को विधानसभा में एसबीसी विधेयक पारित हुआ था।
  • राज्य सरकार ने 16 अक्टूबर 2015 को नोटिफिकेशन जारी करते हुए इसे लागू किया। ये 14 महीने चला और 9 दिसंबर 2016 को हाईकोर्ट ने खत्म किया।
  • हाईकोर्ट द्वारा आरक्षण पर रोक के बाद यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट में है।

ऐसे भी हुए आंदोलन

राज्य में गुर्जर आंदोलन का नेतृत्व कर रहे कर्नल किरोड़ी बैसला की अपील पर हाइवे व रेल ट्रैक जामकर बैठे लोग हिंसा से दूर रहे। लेकिन इससे लाेगों की परेशानी बढ़ती जा रही है। रेलें और बसें रुक रही है, जिनमें गंभीर मरीज व जरूरतमंद भी हैं। लोगों को आने जाने में दिक्कतें हो रही हैं। खुद बैसला अहिंसात्मक आंदोलन पढ़ रहे हैं। ये तीन आंदोलन के बारे में पढ़िए…कैसे अलग है राज्य में चल रहा आरक्षण आंदोलन…।

1.) चिता से चिंता

कटनी में दो साल से ज्यादा लंबा चला : कटनी (मध्यप्रदेश) जिले के बुजबुजा डोकरिया में गजब का आंदोलन हुआ। आंदोलन करने वाले लोग रोज सुबह उठकर चिता पर लेट जाते। जत्थ रोजाना बदलता था। अधिग्रहण के विरोध में 14 नवंबर 2012 को यहां की एक महिला सुनियाबाई ने आत्मदाह कर लिया था। फिर प्रशासन की नींद टूटी।

2.) जल सत्याग्रह

18 दिन तक पानी में खड़े रहे लोग : सितंबर 2012 में नर्मदा बचाओ आंदोलन का जल सत्याग्रह भी सुर्खियों में आया। पुनर्वास की मांग कर रहे सत्याग्रही करीब 18 दिनों तक पानी में खड़े रहे। इसके बाद इंदिरा सागर डैम की ऊंचाई न बढ़ाने की मांग कर रहे नर्मदा बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ताओं ने हरदा में जल सत्याग्रह किया। इसके बाद मध्यप्रदेश सरकार ने मांगें मान ली।

3.) कैंडल मार्च

पेंटिंग्स, कार्टून से विरोध : दिल्ली गैंग रेप के बाद निकाले गए कैंडल मार्च और प्रदर्शन ने सत्ता की नींद उड़ा दी और कानून में बदलाव के लिए सरकार व सिस्टम को मजबूर किया है। इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने परंपरागत नारों को दरकिनार किया और व्यंग्य, कार्टून और पेंटिंग्स को विरोध का जरिया बनाया।


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