असम: में आंदोलन की शक्ल देश से अलग; यहां हिंसा नहीं, गीत-संगीत, डांस, कविता के जरिए विरोध

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गुवाहाटी (रविशंकर रवि). नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ जब पूरे देश में हिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं, इसके विपरीत असम में शांतिपूर्ण माहौल में आंदोलन की अलग-अलग शक्ल देखने को मिल रही हैं। शुरुआती 3 दिनों के दौरान भले ही यहां आंदोलन हिंसक हो गया था, पर उसके बाद यह आंदोलन पूरी तरह से अहिंसा के रास्ते पर चल रहा है।

असमी गमछा आंदोलन का प्रतीक बना

पूर्वोत्तर के लोग सत्याग्रह कर रहे हैं। असमी गमछा आंदोलन का प्रतीक बन गया है। आंदोलन को विस्तार देने के लिए अखिल असम छात्रसंघ (आसू) ने अलग-अलग वर्ग के लोगों को जोड़ा है। शनिवार को राज्यभर में आंदोलन का जिम्मा हजारों महिलाओं ने संभाला। उन्होंने जगह-जगह धरना दिया और गीत-भजन गाते हुए वाद्य यंत्र बजाते हुए, लोक नृत्य करते हुए कानून का विरोध किया। गुवाहाटी के तलाशिल खेल मैदान पर धरने पर बैठी सत्तर साल की गीता लश्कर ने बताया कि जब उनके हजारों बेटे-बेटियां आंदोलन कर रहे हैं, लाठियों की मार झेल रहे हैं तो वह घर में कैसे बैठी रह सकती हैं।

आंदोलन से जुड़े हर तबके के लोग
इससे पहले शुक्रवार को राज्यभर में वकीलों ने प्रदर्शन किया। गुरुवार को राज्यभर में कलाकारों ने अपनी कलात्मक विधाओं के जरिए विरोध दर्ज कराया। कवियों ने कविता पाठ किया, जुबिन गर्ग समेत तमाम गायकों ने गीते गए, वाद्य यंत्र बजाने वालों ने उनका साथ दिया। असमिया सिनेमा के बड़े चेहरे मौजूद रहे। यह सिलसिला राज्य में 14 दिसंबर से शुरू हुआ। इसके बाद से हिंसक आंदोलन अहिंसा की ओर बढ़ा और आम लोग इसमें जुड़ते चले गए। हर तबके के लोग इसमें शामिल हो गए। असमिया अभिनेत्री वर्षारानी विषया कहती हैं कि जब असमिया भाषा ही नहीं बचेगी, तो असमिया फिल्में कौन देखेगा। इसलिए हम लोग अपना काम करते हुए इस आंदोलन को आगे बढ़ा रहे हैं।

अपनी संस्कृति को बचाने के लिए सत्याग्रह
असम साहित्य सभा के अध्यक्ष डाॅ. परमानंद राजवंशी का कहना है कि बिना भाषा के जाति नहीं बचेगी। असम में असमिया नहीं रहेगी तो कहां रहेगी, इसलिए अपनी भाषा को बचाने के लिए हम सत्याग्रह कर रहे हैं, क्योंकि बांग्लादेश से शरणार्थियों के आने से उनकी भाषा बोलने वाले लोग कम हो जाएंगे। आसू के सलाहकार डाॅ. समुज्जले भट्टाचार्य का कहना है कि शांतिपूर्ण आंदोलन चलाने और विस्तार देने के लिए समाज के सभी वर्गोें को जोड़ना जरूरी है। छात्र आंदोलन करेंगे और पढ़ाई भी। उसी तरह महिलाएं घर में अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए आंदोलन कर रही हैं।

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