बर्फ की ताबूत में 29 दिन से लेटी आदिवासी बेटी को न्याय और अग्नि संस्कार का नसीब नहीं

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आदिवासी बहनों सजग हो जाओ, वरना ये लोग तुम्हारी लाश को कबाड़ी में तोलकर बेचेंगे।

गुजरात के सांबरकाठा जिले के खेड़ब्रह्मा तहसील, गाॅव- पाँचमहुड़ा की बहन पिंकी की लाश न्याय और मुक्ति पाने के लिए 29 दिन से अपने पिता के घर में बर्फ की शय्या पर लेटी हुई हैं। ये ह्रदयविदारक घटना किसी की भी आत्मा को झंकझोंर दे रही हैं।


ज्ञात है कि पिंकी 1जनवरी को अपने काॅलेज के वार्षिक कार्यक्रम में गई थी। किसी कारणवश देर हो जाने के कारण पिंकी अपनी दोस्त किंजल के गाँव ‘चिकला’ में रूक जाती हैं। दूसरे दिन यानि 2 जनवरी को किंजल के पिता सुबह ग्यराह बजे पिंकी को खेड़ब्रह्मा तहसील में छोड़कर आ जाते हैं। उसी दिन पिंकी के पिता पिंकी के घर नहीं पहुँचने पर किंजल को दोपहर के करीब डेढ़ बजे फोनकर के पिंकी के बारे में पुछते हैं। जिसमें किंजल अपने पिता के द्वारा पिंकी को खेड़ब्रह्मा में छोड़े जाने की बात कहती हैं। पर पिंकी न तो 2 तरीख और न ही 3 तारीख को अपने घर आती हैं। 4 जनवरी को दोपहर में पिंकी के पिता के पास पुलिस की खबर आती है कि आपकी बेटी पिंकी की लाश खेड़ब्रह्मा तहसील के पास के काॅलेज के सामने के जंगल में पिंकी का शव पेड़ से लटका मिला हैं। उसी दिन यानि 4 जनवरी को पुलिस लाश को सरकारी अस्पताल ले जाती हैं। रात हो जाने के बावजूद भी पुलिस पुरूष डाॅ. के द्वारा ‘पोस्टमाटम’ करवा देती हैं। जबकि नियम कहता है, कि सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले पोस्टमाॅटम नहीं कर सकते हैं। इसके आलावे किसी भी मृत स्त्री का पोस्टमाॅटम स्त्री डाॅक्टर के द्वारा किए जाना हैं। पर ये दोनों नियमों का पुलिस और डाॅक्टर ने धज्जियाॅ उड़ा दी ।


पिंकी की लाश संदिग्ध हालत में मिलते हुए भी आजतक पुलिस न तो प्राथमिकी दर्ज़ की हैं और न ही कोई जाॅच- पड़ताल,ऊपर से प्राथमिकी दर्ज़ करने जा रहे लोगों को पुलिस धमका कर के घर भेज दे रही हैं। हद तो तब है कि इस इलाके का विधायक भी आदिवासी है। क्या इस विधायक का जमीर मर चुका है या सत्ता की गुलामी में अपने आदिवासियत को गिरवी रख दिया हैं।
सांबरकाठा जिला अनुसूची क्षेत्र के अन्तर्गत आता हैं। इस जिले के लोगों का रिवाज हैं कि अगर किसी भी महिला या पुरूष की मौत ‘अप्रकृतिक’ द्वारा होता है तो जबतक उस मृतक व्यक्ति को न्याय नहीं मिल जाता है तब तक उसकी लाश घर में ही पड़ी रहती हैं। इस रिवाज को ‘चड़ोतरूं’ कहते हैं।


वाईब्रेन्ट गुजरात, बु्लेट ट्रेन, मेट्रो ट्रेन, सी-प्लेन गुजरात का सच्चाई ये है कि गुजरात के आदिवासियों का गुजरात में न तो न्याय है न ही अधिकार । ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओं,’ का अभियान किसके लिए है क्या ये भी दस प्रतिशत आरक्षितों के लिए है ?
अब पूरे भारत में आदिवासी महिलाओं के प्रति जो अनदेखी का व्यवहार हो रहा है इससे साफ जाहिर होता है कि अब पूरे भारत की आदिवासी महिलाओं को अपने अधिकार के लिए गोलबंध होना पड़ेगा वरना ये लोग भविष्य में आदिवासी महिलाओं की लाश को कबाड़ी में तोलकर बेचेंगे।
🌾बरखा लकड़ा🌾
आदिवासी महिला शक्ति भारत


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