कुर्मी को आदिवासी में शामिल करने की अनुशंसा करने वाले नेताओं को 2019 में नेस्तानाबूद कर देंगे

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जय आदिवासी युवाशक्ति के प्रदेश प्रभारी संजय पाहन का बड़ा बयान, कहा, कुर्मी को आदिवासी में शामिल करने की अनुशंसा करने वाले नेताओं को 2019 में नेस्तानाबूद कर देंगे, आदिवासी युवा मोर्चा ने भाजपा को बताया आदिवासियों के लिए ख़तरा :

राज्य में जहां आदिवासी की श्रेणी में शामिल होने के लिए तेली और कुर्मी समाज अपनी राजनीतिक ताकत दिखा चुकी है, वहीं आदिवासी समाज इसे आज अपने हक और अधिकार में दूसरे समुदाय के द्वारा सेंधमारी के रूप में देख रहा है. कुर्मी समाज अनुसूचित जनजाति में शामिल होने के प्रयास के तहत दो सांसदों और 42 विधायकों के समर्थन पत्र मुख्यमंत्री को सौंपने के बाद आदिवासी जनमानस आक्रोशित है और हस्ताक्षर करने वाले सांसद और विधायकों का राज्य भर में 200 से अधिक सभा और पुतला दहन हो चुका है. इसी अलोक में जयस के द्वारा 10 मार्च को आक्रोश रैली करने की तैयारी जोरो पर है. आदिवासियों के बीच आखिर इस संबंध में क्या पीड़ाएं है, क्यों समाज को अपनी बात कहने के लिए रैली आहूत करना पड़ा है.

इन सवालों को समझने के लिए खबरिया वेबसाइट न्यूजविंग ने जय आदिवासी युवाशक्ति के प्रदेश प्रभारी संजय पाहन एवं रांची जयस प्रभारी शशि और आदिवासी युवा मोर्चा के सांयोजक एल्विन से बात की, इस बातचीत के मुख्य अंश.

न्यूज विंग – आखिर क्या विवशता आ गयी की आदिवासी समाज को अपनी बात रखने के लिए रैली करनी पड़ रही है?

संजय पाहान – देश के संविधान द्वारा आदिवासियों को अधिकार मिले है, अब तक उसे लागू नहीं किया गया. हमारे अधिकारों का रोजबरोज हनन किया जा रहा है. राज्य में आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन के अधिकार के साथ आरक्षण में भी कुर्मी समाज सेंधमारी करना चाहती है. और वह आदिवासी बनने का इरादा रख रही है, ऐसे में राज्य के आदिवासी अधिकारों का हनन होगा. जमीन की खरीद बिक्री का दायरा बढ़ेगा, जिससे आदिवासियों की जमीन का अवैध व्यापार होने की आशंका है.

न्यूज विंग – 42 विधायकों ने जो पत्र कुर्मी समाज को आदिवासी में शामिल करने के लिए मुख्यमंत्री को सौंपा है, तो वो क्यों आदिवासियों की चिंताओं को नहीं समझ रहे है ?

संजय – आदिवासी युवा अब समझदार हो गये हैं, वे पढ़ लिख रहे हैं. अब आदिवासी समाज के युवाओं में राजनीतिक चेतना जागृत हो चुकी है, इसलिए वैसे नेताओं को हम चेतावनी देते हैं 2019 में हस्ताक्षर करने वाले नेताओं को नेस्तानाबूद कर देंगे. राज्य की सभी 32 जनजातियों में अब एकजुटता हो चुकी है और नेताओं का राजनीतिक खेल भी समझ चुके हैं. उन्हें आदिवासी समाज सबक सिखायेगी.

न्यूज विंग – अलग राज्य झारखंड बनने के बाद भी आदिवासियों की स्थिति हाशिये पर है, इस मामले में आपकी क्या दृष्टिकोण हैं ?

एल्विन – भाजपा की सरकार जब से आयी है तब से आदिवासियों के अधिकारों पर खतरा मंडरा रहा है. वैसे तो भाजपा आदिवासियों की हितैषी बनती है पर उसका एक ही उद्देश्य है कि प्रदेश में आदिवासियों का अस्तित्व मिटाकर आदिवासियों को जमीन से बेदखल करके जमीन पूंजीपतियों को दे दे. भाजपा के द्वारा राज्य में तरह-तरह के हथकंडे अपनाये जा रहे हैं, कभी सरना-इसाई के नाम पर आदिवासियों को भड़का रही है, तो कभी कुर्मी समाज को आदिवासी का दर्जा देने को लेकर टकराव की स्थिति उत्पन्न कर रही है. इस तरह के तमाम उपायों द्वारा वह आदिवासियों के अस्तित्व को मिटाने की साजिश राज्य में कर रही है, जिसका हमलोग पूरजोर विरोध करते हैं.

न्यूज विंग- ये जो अनुसंशा पत्र सौंपा गया है उसमें केवल भाजपा के ही विधायक नही हैं, जेएमएम के और अन्य दलों के नेता भी हैं, इसको आप किस नजरिये से देखते हैं?

एल्विन – ये जितने भी राजनीतिक दल के नेता हैं, जिन्होंने इस पत्र में हस्ताक्षर किये है, वो सिर्फ अपने राजनीतिक स्वार्थ को देखते हुए चाल चल रहे हैं, ताकि उन्हें 2019 के चुनाव में इसका फायदा मिले. वो अपना वोट बैंक बना रहे हैं.

न्यूज विंग- ताला मरांडी ने कहा था कि कुर्मियों को आदिवासी का दर्जा देने से आदिवासियों की संख्या बढ़ेगी, उनके ताकत में भी इजाफा होगा, उनके इस बयान को आप किस तरह देखते है ?

संजय – अगर कुर्मी समाज आदिवासी बन जाता है तो ये न सिर्फ हमारे जल, जंगल, जमीन पर हमला होगा, बल्कि इसे हमारे संस्कृति पर भी हमला माना जाएगा. आदिवासी कोई कैसे बन सकता है. आदिवासियों की अपनी रूढ़ी व्यवस्था होती है, रंग रूप अलग होता है, अपनी भाषा होती है. एक आदिवासी अपने आदिवासी मां के गर्भ से ही पैदा हो सकता है. वह किसी के अनुशंसा से नहीं बन सकता है.

न्यूज विंग – आदिवासी नेता सांसद विधायक बनते हैं, पर बाद में वे आदिवासियों की पैरोकारी नहीं करते हैं पर बाद में पूंजीपतियों के लिए काम करने लगते हैं. इस पर आप कैसे अंकुश लगायेंगे ?

संजय – हम दबाव समूह बनायेंगे. हम देखते हैं कोई भी आदिवासी विधायक सांसद पूंजीपतियों के सामने बात ढंग से नहीं कर पाता. मगर अब आदिवासी युवा सब कुछ जानते हैं, उन्हें संविधान और अपने अधिकारों की जानकारी है, समाज के धोखेबाज नेताओं को आनेवाले समय में नेस्तनाबुद कर दिया जाएगा.

न्यूज विंग – आनेवाले समय में आदिवासी नेताओं पर नियंत्रण की बात आपलोग कह रहे हैं, इस कोशिश पर आदिवासी समाज की क्या प्रतिक्रियाएं मिल रही है?

शशि – सभी जगह से अच्छी प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं, चाहे वह युवा हो या बुजुर्ग सभी में जागरुकता आ गयी है और हम यह दिखा देंगे 10 मार्च की रैली में कि अब आदिवासियों को दबाया नहीं जा सकता.


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