नेताजी का आख़िरी सिपाही ये क्यूं कहता था कि सुभाष चंद्र बोस विमान हादसे में नहीं मरे?

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नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिंद फौज के आखिरी सिपाही निजामुद्दीन ने 6 फरवरी, 2017 को आजमगढ़ के मुबारकपुर में आखिरी सांस ली. तब वो 116 साल के थे. निजामुद्दीन नेताजी के पर्सनल ड्राइवर भी थे और बॉडीगार्ड भी. कर्नल निजामुद्दीन आजमगढ़ में अपनी पत्नी अजबुल निशा और अपने छोटे बेटे शेख अकरम के साथ रहते थे. निशा की उम्र भी 107 साल है.

ये वही निजामुद्दीन हैं, मंच पर जिनके पैर छूकर नरेंद्र मोदी ने आशीर्वाद लिया था. बनारस में अपना लोकसभा चुनाव प्रचार शुरू किया था. फिर मोदी प्रधानमंत्री भी बने. पिछले साल नेताजी से जुड़ी फाइलों को सार्वजनिक करने की प्रधानमंत्री की घोषणा के बाद निजामुद्दीन की बूढ़ी आंखों में उम्मीद की नई चमक दिखाई दी थी. उस समय निजामुद्दीन ने कहा था कि उनके गायब होने के रहस्य से पर्दा हटाने के लिए जान देने में भी पीछे नहीं रहूंगा. वो इस बात पर भी जोर देते थे कि फाइलों के अलावा बोस को लेकर बने मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट भी सार्वजनिक की जाए.

‘नेताजी विमान हादसे में नहीं मरे थे’

कर्नल निजामुद्दीन नेताजी सुभाष चंद्र बोस के 1945 में विमान हादसे में मारे जाने वाली थ्योरी का सिरे से खंडन करते थे. उनका दावा था कि आजादी के वक्त नेताजी जिंदा थे. उनका ये भी कहना था कि कुछ लोगों ने अपना हित साधने के लिए जान बूझ के नेताजी की मौत की अफवाह उड़ाई थी. निजामुद्दीन के मुताबिक वो खुद नेताजी को क्रैश के 3-4 महीने बाद बर्मा- थाईलैंड बॉर्डर पर छोड़ के आए थे.

आजाद हिंद फौज का आईकार्ड अपने पास सुरक्षित रखे निजामुद्दीन से पिछले दिनों नेताजी की परपोती राज्यश्री चौधरी ने मुलाकात की थी. नेताजी से उनसे आखिरी मुलाकात के बारे में जब राज्यश्री ने पूछा तो निजामुद्दीन बोले,

‘मैं वो दिन जीते जी कभी नहीं भूल सकता हूं. मैंने बर्मा-थाईलैंड बॉर्डर पर सीतांगपुर नदी के पास कार से उतारा था. मैं उनके साथ खुद भी जाना चाहता था लेकिन उन्होंने यह कहकर वापस भेज दिया कि हम आजाद भारत में मिलेंगे. इसके बाद नेताजी से मेरी कोई मुलाकात नहीं हुई.’

निजामुद्दीन एक वाकया सुनाया करते थे,

एक बार बर्मा के घने जंगल में मैं और नेता जी साथ थे. नेता जी ने मुंह पोंछने के लिए जेब से रुमाल निकाली तो गिर गई.जैसे ही मैं रुमाल उठाने के लिए झुका तो झाड़ी से नेताजी को निशाने पर लेकर करके तीन गोलियां चलीं. मैं नेताजी के सामने आ गया और तीनों गोलियां मेरी पीठ में लग गईं. जवाबी फायरिंग में झाड़ी में छिपे अंग्रेज दुश्मन की मौत हो गई. फिर मैं बेहोश हो गया. जब होश आया तो नेताजी को मैंने अपने ऊपर झुका हुआ पाया. उसी समय नेताजी ने मुझे ‘कर्नल’ कहकर पुकारा था. मैंने नेताजी से कहा था कि मुझे पद नहीं मेरा देश और आपका साथ प्यारा है. आजाद हिंद फौज के क्रांतिकारी सिपाही डा. लक्ष्मी सहगल ने बंदूक की संगीन गर्म करके मेरी पीठ पर लगी गोलियों को निकाला था.

इसी के साथ आजाद हिंद फौज अब बस डाक्यूमेंट्स और किस्सों में रह गई. निजामुद्दीन इस फौज के आखिरी सिपाही थे.


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