कौन हैं अहमद पटेल, जिनकी जीत कांग्रेस के लिए इतनी जरूरी थी

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गुजरात में बीजेपी का गणित नहीं चल पाया है. जिस राज्यसभा सीट को पूरी कांग्रेस या कहें गांधी परिवार की हार-जीत से जोड़कर देखा जा रहा था. लंबे सियासी ड्रामे के बाद वो आखिरकार कांग्रेस ने जीत ली है. कांग्रेस के कैंडिडेट अहमद पटेल को जीत के लिए जरूरी 44 वोट मिले हैं. 46-46 वोट पाकर जीत तो बीजेपी के कैंडिडेट यानी खुद अमित शाह और स्मृति इरानी भी गए हैं. मगर तीसरे कैंडिडेट बलवंत सिंह राजपूत की हार निश्चित तौर पर बीजेपी आलाकमान के गले नहीं उतरेगी. बलवंत को 38 वोट ही मिले.

बनता-बिगड़ता गणित

राज्य सभा के लिए 176 विधायकों को वोट देना था. एक सीट जीतने के लिए कम से कम 45 विधायकों के वोट की जरूरत थी. मगर जब वोटिंग की बारी आई तो कांग्रेस के दो विधायकों राघवजी पटेल और भोला भाई गोहिल ने ही दगा दे दी. ये दोनों उन्हीं 44 विधायकों में थे, जिन्हे कांग्रेस ने कैद कर रखा था. मगर दगा देने वाले विधायक क्रॉस वोटिंग करते वक्त ये भूल गए कि वे अब भी कांग्रेस के ही सदस्य हैं और अपने वोटों का सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं कर सकते. बस इसी बात को कांग्रेस ने पकड़ लिया और चुनाव आयोग में इनके वोट रद करने की मांग जोरदारी से की. इसे चुनाव आयोग ने मान भी लिया और दोनों के वोट कैंसल कर दिए. ऐसा करते ही राज्यसभा पहुंचने के लिए मैजिक नंबर 45 से घटकर 44 रह गया. फिर पटेल को 44 ही वोट मिले और वह जीतने में कामयाब रहे.

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अहमद पटेल के लिए कांग्रेस इतनी व्याकुल क्यों थी

क्योंकि अहमद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के सलाहकार हैं. वो देश की सबसे पुरानी पार्टी की मुखिया को लंबे समय से सलाह दे रहे हैं. उन्हें गांधी परिवार से लेकर कांग्रेस पार्टी तक, सबका तिया-पांचा पता है. ये अहमद पटेल ही हैं, जिनकी वजह से सोनिया भारतीय राजनीति में स्थापित हो पाईं, अपने प्रधानमंत्री पति राजीव गांधी की हत्या के बाद इतनी बड़ी पार्टी संभाल पाईं, नरसिम्हा राव जैसे नेताओं से रिश्ते बिगड़ने के बावजूद बनी रहीं. आज भी कांग्रेस राहुल गांधी या दूसरे किसी नेता से ज्यादा सोनिया गांधी पर निर्भर है. सोनिया के इस सफर के पीछे अहमद का बड़ा हाथ है.

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अहमद इंदिरा गांधी के वक्त से कांग्रेस में हैं. 1977 के चुनाव में जब इंदिरा को भी पासा पलटने की आशंका थी, तब ये अहमद पटेल ही थे, जो उन्हें अपनी विधानसभा सीट पर मीटिंग आयोजित करने के लिए राजी कर लाए थे. 1977 के आम चुनाव में जब कांग्रेस औंधे मुंह गिरी थी और गुजरात ने उसकी कुछ साख बचाई थी, तो अहमद उन मुट्ठीभर लोगों में एक थे, जो संसद पहुंचे थे. 1980 के चुनाव में धाकड़ वापसी करने के बाद जब इंदिरा ने अहमद को कैबिनेट में शामिल करना चाहा, तो उन्होंने संगठन में काम करने को प्राथमिकता दी.

अशोक गहलोत और मनमोहन सिंह के साथ अहमद पटेल
अशोक गहलोत और मनमोहन सिंह के साथ अहमद पटेल

क्योंकि अहमद को सत्ता में न रहकर भी सत्ता में रहना आता है

पहले इंदिरा और फिर राजीव. राजीव ने भी 1984 चुनाव के बाद अहमद को मंत्रीपद देना चाहा, लेकिन अहमद ने फिर पार्टी को चुना. राजीव के रहते उन्होंने यूथ कांग्रेस का नेशनल नेटवर्क तैयार किया, जिसका सबसे ज्यादा फायदा सोनिया को मिला. अहमद के आलोचक कहते हैं कि वो आज जो भी हैं, गांधी परिवार के प्रति अपनी न डिगने वाली निष्ठा की वजह से हैं, जिस पर कोई सवाल नहीं उठा सकता. अहमद के राजीव के साथ मतभेद चाहे जैसे रहे हों, लेकिन वो राजीव को कितना एडमायर करते थे, इस पर कोई संदेह नहीं है. आज भी राजीव के बारे में बात करते हुए अहमद की आंखें छलक जाती हैं. गांधी परिवार के इतना करीब रहते हुए अहमद ने सीखा कि पावर में न रहते हुए भी पावर में कैसे रहा जाता है.

राजीव गांधी के साथ अहमद पटेल
राजीव गांधी के साथ अहमद पटेल

पॉलिटिकल करियर: तालुका अध्यक्ष से प्रदेश अध्यक्ष तक

गुजरात के भरूच जिले के अंकलेश्वर में पैदा हुए पटेल तीन बार लोकसभा सांसद और चार बार राज्यसभा सांसद रह चुके हैं. पटेल ने अपना पहला चुनाव 1977 में भरूच से लड़ा था, जिसमें वो 62,879 वोटों से जीते. 1980 में उन्होंने फिर यहीं से चुनाव लड़ा और इस बार 82,844 वोटों से जीते. 1984 के अपने तीसरे लोकसभा चुनाव में उन्होंने 1,23,069 वोटों से जीत दर्ज की थी. 80 और 84, दोनों चुनावों में जनता पार्टी के चंदूभाई देशमुख दूसरे नंबर पर रहे थे. 1993 से अहमद राज्यसभा सांसद हैं और 2001 से सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार.

सोनिया के साथ अहमद
सोनिया के साथ अहमद

इसके अलावा 1977 से 1982 तक पटेल गुजरात की यूथ कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे. सितंबर 1983 से दिसंबर 1984 तक वो ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के जॉइंट सेक्रेटरी रहे. 1985 में जनवरी से सितंबर तक वो प्रधानमंत्री राजीव गांधी के संसदीय सचिव रहे. उनके अलावा अरुण सिंह और ऑस्कर फर्नांडिस भी राजीव के संसदीय सचिव थे. सितंबर 1985 से जनवरी 1986 तक पटेल ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के जनरल सेक्रेटरी रहे. कांग्रेस के तालुका पंचायत अध्यक्ष के पद से करियर शुरू करने वाले पटेल जनवरी 1986 में गुजरात कांग्रेस के अध्यक्ष बने, जो वो अक्टूबर 1988 तक रहे. 1991 में जब नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने, तो पटेल को कांग्रेस वर्किंग कमेटी का सदस्य बनाया गया, जो वो अब तक हैं.

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1996 में पटेल को ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी का कोषाध्यक्ष बनाया गया था. उस समय सीताराम केसरी कांग्रेस के अध्यक्ष थे. हालांकि, साल 2000 सोनिया गांधी के निजी सचिव वी जॉर्ज से तकरार होने के बाद उन्होंने ये पद छोड़ दिया था और अगले ही साल से सोनिया के राजनीतिक सलाहकार बन गए. संगठन में इन पदों के अलावा वो सिविल एविएशन मिनिस्ट्री, मानव संसाधन मंत्रालय और पेट्रोलियम मंत्रालय की मदद के लिए बनाई गईं कमेटी के सदस्य भी रह चुके हैं. 2006 से वो वक्फ संयुक्त संसदीय समिति के सदस्य हैं. अहमद गुजरात यूथ कांग्रेस कमेटी के सबसे युवा अध्यक्ष तो रहे ही, वो अहसान जाफरी के अलावा दूसरे ऐसे मुस्लिम हैं, जिन्होंने गुजरात से लोकसभा चुनाव जीता. अहसान जाफरी की 2002 के गुजरात दंगों में हत्या कर दी गई थी, जिसका आरोप बजरंग दल पर लगता है.

कांग्रेस के पास पटेल जैसा दूसरा कोई नेता नहीं

अहमद पटेल को 10 जनपथ का चाणक्य कहा जाता है. वो कांग्रेस परिवार में गांधी परिवार के सबसे करीब और गांधियों के बाद ‘नंबर 2’ माने जाते हैं. बेहद ताकतवर असर वाले अहमद लो-प्रोफाइल रखते हैं, साइलेंट हैं और हर किसी के लिए सीक्रेटिव हैं. गांधी परिवार के अलावा किसी को नहीं पता कि उनके दिमाग में क्या रहता है. पटेल की कोशिश रहती है कि दिल्ली और देश के मीडिया में उनकी जरा भी प्रोफाइल न हो. वो कभी टीवी चैनलों पर नहीं दिखते, लेकिन उन पर खबरें कंट्रोल करने का आरोप लगता रहा है. अजीब या फंसाने वाले सवालों के जवाब में वो कुछ बोलते नहीं, बस मुस्कुरा देते हैं. गांधी परिवार और प्रधानमंत्रियों से लगातार मिलते रहने के बावजूद उनके साथ पटेल की तस्वीरें बेहद चुनिंदा हैं. उनके अंदर सुनने का हुनर गजब का है. ये भी रोचक है कि उनके जैसे रसूख वाले नेता का विकीपीडिया पेज 20 लाइनों में खत्म हो जाता है.

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आलोचक और समर्थक अलग-अलग छोरों पर

पटेल के आलोचक उन्हें मैनिपुलेटर बताते हैं, लेकिन खुद पटेल का मानना है कि वो राजनीति में अनफिट हैं. वो कहते हैं, ‘मैं सिर्फ सोनिया गांधी के एजेंडे पर अपनी पूरी ईमानदारी से काम करता हूं.’ हालांकि, ये सच्चाई है कि पटेल हर मिलने वाले को मनोवैज्ञानिक नज़र से देखते हैं. उनका यही हुनर उन्हें ‘किंगमेकर’ बनाता है. कभी साउथ गुजरात यूनिवर्सिटी की टीम में बैट्समैन रहे पटेल आज शायद इंडियन क्रिकेटर्स के नाम भी न जानते हों, लेकिन पार्टी चलाना उन्हें आता है. इस पर मजाक करते में गुजरात के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ‘अहमद भाई को पता है कि कांग्रेस को चलाने के लिए तेल कहां से आता है.’

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पटेल के आलोचक उन पर गुजरात कांग्रेस को बर्बाद करने का आरोप लगाते हैं. वो कहते हैं कि पटेल को 1986 में गुजरात कांग्रेस का अध्यक्ष बनाए जाने पर उन्होंने सीएम माधव सिंह सोलंकी को अमर सिंह चौधरी से बदल दिया. इसके बाद से कांग्रेस माधव सिंह जैसी परफॉर्मेंस कभी दोहरा नहीं पाई. माधव के वक्त में कांग्रेस ने 182 में से 149 सीटें जीती थीं. उनका जनता में पैठ न होने का भी आरोप लगता है. आलोचक कहते हैं कि वो अपने दम पर चुनाव नहीं जीत सकते और गुजरात में कांग्रेस जैसे-जैसे नीचे गई, अहमद का ग्राफ बढ़ता गया. हालांकि, उनके गृहक्षेत्र भरूच में RSS ने धर्म के बहाने उन्हें इतना निशाना बनाया कि उन्हें पसंद करने वालों की तादाद बढ़ती रही. भरूच में उनके समर्थक उनके नाम की कसमें खाते हैं.

हामिद अंसारी और शरद यादव के साथ अहमद पटेल
हामिद अंसारी और शरद यादव के साथ अहमद पटेल

राजनीति के शोर से दूर है फैमिली लाइफ

अहमद नितांत पारिवारिक आदमी हैं. इतने कि रूढ़िवादी भी कहे जा सकते हैं. टीवी कम देखते हैं, क्योंकि उस पर खबर कम और चकाचौंध ज्यादा होती है. अहमद मानते हैं कि आम भारतीय की नब्ज़ जानने के लिए अखबार बेस्ट हैं. घर का खाना खाते हैं. कोशिश करते हैं कि फ्लाइट न लेनी पड़े और अधिकतर ट्रेन से यात्रा करते हैं. इतवार को गाने सुनने के अलावा हफ्ते में खुद को कभी वक्त नहीं दे पाते, क्योंकि सुबह 9 से सुबह 4 बजे तक काम करते हैं. फिर भी, रवैया मौजूदा नेताओं जैसा नहीं है कि इस बात का प्रचार करें. इसी व्यस्तता में वो अखबारों तक सीमित रह जाते हैं, किताबों तक नहीं पहुंच पाते.

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1949 में मोहम्मद इशकजी पटेल और हवाबेन मोहम्मद भाई के घर पैदा हुए अहमद के पिता भी कांग्रेस में थे. वो भरूच की तालुका पंचायत सदस्य थे और इलाके के नामी कांग्रेसी थे. अहमद को अपना राजनीतिक करियर बनाने में पिता से बहुत मदद मिली, लेकिन उनके बच्चे राजनीति से बहुत दूर हैं. 1976 में उन्होंने मेमूना अहमद से शादी की और उनके दो बच्चे हुए. एक बेटा और बेटी, लेकिन दोनों कांग्रेस या किसी भी पार्टी की पॉलिटिक्स से कोसों दूर है. अहमद के करीबी मानते हैं कि अहमद के रहते उनके बच्चे कभी राजनीति में नहीं आएंगे. उनके जानने वाले उन्हें साधारण आदतों वाला आम आदमी बताते हैं, जो पर्सनल-पॉलिटिकल महात्वकांक्षा से दूर है. कुछ ये भी कहते हैं कि पटेल ब्रिलियंट नहीं, लेकिन सेंसिबल हैं.

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इतने लंबे करियर में पटेल की सेक्युलर नेता की छवि हमेशा बरकरार रही. वो हर हफ्ते शुक्रवार को नमाज़ पढ़ते हैं, लेकिन उनकी मौजूदगी से भीड़-भाड़ न हो जाए, इसलिए मस्जिदें बदलती रहती हैं. राजीव गांधी के साथ उनकी करीबी के बारे में कुछ नेता भरूच को भी जिम्मेदार मानते हैं. असल में राजीव के पिता फिरोज गांधी भी भरूच में पैदा हुए थे.

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क्या है जो अहमद पटेल को दूसरों से अलग बनाता है

अमर सिंह जैसे नेताओं के उलट अहमद दिखावा करने के लिए कभी अपने कॉन्टैक्ट्स का नाम यहां-वहां नहीं गिराते. उनके हर जगह कॉन्टैक्ट्स हैं. जुडिशरी, इंडस्ट्री, कॉरपोरेट हाउस, मीडिया, आर्ट्स… अहमद पटेल को कांग्रेस का अरुण जेटली भी कहा जा सकता है. दोस्तों को याद करने के मामले में भी वो आगे हैं. गुजरात के ही कई नेता बताते हैं कि होली, दीवाली, ईद और क्रिसमस जैसे त्योहारों या दूसरे खास मौकों पर अहमद अपने दोस्तों तक बधाई पहुंचाना नहीं भूलते. कांग्रेस में कुछ भी बिगड़ने पर भले सबसे पहले अहमद को निशाना बनाया जाता हो, लेकिन इन्हें सोनिया का भरोसा हासिल है.

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कांग्रेस के ही एक वरिष्ठ बताते हैं कि कांग्रेस में उठने के लिए अहमद से नजदीकी जरूरी है, आप उनकी दुश्मनी नहीं झेल सकते. कई मौकों पर ऐसा हुआ भी है, जब कांग्रेसी नेताओं ने सार्वजनिक मंच से पार्टी की आलोचना की हो, लेकिन अहमद से बात होने के बाद वो सफाई देने लगे. कोई अहमद की बैड-बुक में नहीं रहना चाहता. आलम ये है कि बुरा छोड़िए, कांग्रेसी इनके बारे में अच्छा बोलने से भी हिचकते हैं. 2004 से 2014 के बीच पार्टी की बैठकों में सोनिया जब भी ये कहतीं कि वो सोचकर बताएंगी, तो मान लिया जाता कि वो अहमद से सलाह लेकर फैसला करेंगी. यहां तक कि यूपीए 1 और 2 के ढेर सारे फैसले पटेल की सहमति के बाद लिए गए. कांग्रेस की टॉप लीडरशिप में उन्हें ‘क्राइसिस मैन’ माना जाता है, जो बैकरूम नेगोशिएशन में माहिर हैं.

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मोदी अच्छा-अच्छा बोले, लेकिन अहमद को गवारा नहीं हुआ

नरेंद्र मोदी से अहमद का अलग सा नाता रहा है. 2012 की चुनावी रैली में नरेंद्र मोदी उनका जिक्र करते हुए ‘अहमद मियां पटेल’ कहते हैं. बाद में मोदी ने कहा कि उन्होंने ‘मियां’ सम्मान में कहा था, लेकिन कहने वाले कहते हैं कि वो तंज के लहजे में कहा गया था. इशारा ये था कि कांग्रेस एक मुस्लिम को मुख्यमंत्री बनाएगी. नरेंद्र मोदी इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते. वो अहमद पटेल को अपना दोस्त बताते हुए कहते हैं कि वो उन्हें ‘बाबू भाई’ के नाम से पुकारते थे. मोदी कहते हैं कि किसी जमाने में वो और अहमद अच्छे दोस्त हुआ करते थे, एक-दूसरे के घर आना-जाना था. नरेंद्र मोदी दुख जताते हैं कि अब अहमद पटेल उनका फोन तक नहीं उठाते.

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वहीं अहमद पटेल इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते. वो कहते हैं, ‘मैं मोदी से सिर्फ एक बार 1980 में मिला था. उस वक्त के प्रधानमंत्री राजीव गांधी की जानकारी में मेरी ये मुलाकात हुई थी. 2001 में मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री बनने के बाद से मैंने उनके साथ एक कप चाय भी नहीं पी है.’ बीजेपी की तरफ से पीएम कैंडिडेट बनाए जाने पर दूरदर्शन ने नरेंद्र मोदी का एक इंटरव्यू लिया था और अहमद पटेल को दोस्त बताने वाला हिस्सा काटकर इंटरव्यू टेलिकास्ट किया था, जिस पर बाद में विवाद हुआ.

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कांग्रेस में क्या है अहमद का भविष्य

अहमद कई मौकों पर कह और जता चुके हैं कि सोनिया को अभी पार्टी की कमान राहुल के हाथ में नहीं देनी चाहिए. हालांकि, ये स्पष्ट नहीं है कि वो ऐसा क्यों कहते हैं. इसके पीछे सोनिया और राजीव से उनका लगाव भी हो सकता है और ये दूरदर्शिता भी कि राहुल अकेले अभी की राजनीति संभालने की स्थिति में नहीं है. हालांकि, ये जरूर साफ है कि राहुल की कांग्रेस में अहमद का वो रसूख नहीं रहेगा, जो राजीव और सोनिया की कांग्रेस में रहा है. माधव सिंह सोलंकी के बेटे भरत सिंह सोलंकी को जब गुजरात PCC का अध्यक्ष बनाया गया था, तो बताते हैं कि भरत ने पहले राहुल गांधी से ये छूट मांगी थी कि वो खुले हाथ से फैसला ले सकेंगे और उसमें अहमद का दखल नहीं होगा. इसके अलावा अगस्ता वेस्टलैंड और नीरा राडिया टेप के जिन्न जब-जब बोतलों से बाहर आएंगे, अहमद पटेल का जिक्र जरूर होगा.

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अहमद ने अब एक बार फिर इतने कांटे का मुकाबला यानी गुजरात में राज्यसभा सीट जीतकर ये बता दिया है कि वो कांग्रेस के लिए कितने जरूरी हैं.

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