गुजरात के सातवें मुख्यमंत्री माधव सिंह सोलंकी: एक पोस्टकार्ड की वजह से सियासत में आया यह नेता चार बार गुजरात का मुख्यमंत्री बना

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गुजरात में पावागढ़ की पहाड़ी से एक नदी निकलती है, ढाढर. करीब सौ किलोमीटर से ज्यादा का सफ़र करके यह नदी भरूच जिले मेंपहुंचती है. यहां से यह अरब सागर की तरफ बढ़ जाती है. भरूच में इस नदी से लगभग एक मील दक्षिण में एक कस्बा बसा हुआ है, आमोद. यह 1940 के दशक की बात है. एक लड़का मैट्रिक पास करने के बाद अपने भविष्य के लिए जद्दोजहद कर रहा था. उसके सामने वही सवाल था जो उसके पिता के सामने एक पीढ़ी पहले हुआ करता था, आगे की पढ़ाई के लिए पैसे कहां से आएंगे?

उसके परिवार के पास महज़ एक बीघा की खेती थी. पिता फूल सिंह बड़ी मुश्किल से आठवीं तक तालीम लेने में कामयाब रहे थे. पैसे केअभाव में वो आगे न पढ़ सके. हालांकि इस तालीम ने उन्हें प्राइमरी स्कूल में सात रुपए के वेतन वाली मास्टर की नौकरी दिला दी. इतने पैसे में घर का खर्च भी मुश्किल से चल पाता था. ऐसे में आगे की पढ़ाई का पैसा कहां से आए?

महागुजरात आंदोलन के नायक इंदु लाल याग्निक की याद में 1999 में जारी डाक टिकट
महागुजरात आंदोलन के नायक इंदु लाल याग्निक की याद में 1999 में जारी डाक टिकट

अपने किसी परिचित के मार्फ़त लड़का गुजरात के प्रसिद्ध गांधीवादी नेता इंदु लाल याग्निक से मिला. इंदु लाल ने उसे 10 रुपए माहवार वजीफा देने की बात कही. रहने का ठिकाना मिला साबरमती आश्रम, गुजरात. पढ़ाई फिर से चल निकली. धीरे-धीरे लड़के को पढ़ने का चस्का लग गया. वो हर रविवार की सुबह अहमदाबाद के गुजरी बाजार में घूमता दिखाई देता. यहां किताबें रद्दी के भाव में मिल जाया करतीं. अपने वजीफे से बचाए हुए रुपए वो यहां खर्च देता. उसने उस समय सोचा भी नहीं होगा कि कुछ साल बाद उसकी खुद की लाइब्रेरी में 15,000 से ज्यादा किताबें होंगी. इस लड़के का नाम था, माधव सिंह सोलंकी.

एक पत्रकार जो राजनीति में आया

बीए के पहले साल में माधव सिंह सोलंकी इंदु लाल याग्निक के पास पहुंचे. उस समय इंदु लाल याग्निक ‘ग्राम विकास’ नाम से एक साप्ताहिक पत्रिका निकाला करते थे. माधव सिंह ने उनसे कहा कि उन्हें भी इस पत्रिका के लिए कुछ लिखना है. इंदु लाल ने जवाब में ग्राम विकास के लेखों की एडिटिंग और कुछ अंग्रेजी लेखों के गुजराती अनुवाद का जिम्मा दे दिया. कॉलेज से छूटने के बाद माधव सिंह की साइकिल साबरमती आश्रम की बजाय अहमदाबाद के राईखाड इलाके की तरफ घूमने लगी. यहां ‘ग्राम विकास’ का दफ्तर हुआ करता था. दो वर्ष तक यह पत्रिका जैसे-तैसे निकलती रही और बाद आर्थिक तंगी के चलते बंद हो गई. माधव सिंह सोलंकी की ग्रेजुएशन पूरी हो चुकी थी. उन्हें आगे की पढ़ाई और घरवालों की मदद के लिए नौकरी की दरकार थी.

माधव सिंह राजनीति में आने से गुजरात समाचार में सब एडिटर हुआ करते थे
माधव सिंह राजनीति में आने से पहले गुजरात समाचार में सब एडिटर हुआ करते थे

अहमदाबाद के रेवड़ी बाजार में गुजरात समाचार का दफ्तर था. इस अखबार के मालिक इंद्रवदन मेहता के हाथ में एक ऐसे आदमी का सिफारिशी पत्र था, जिसे वो सम्मानवश इनकार नहीं कर सकते थे. खत का मजमून था-

“माधव सिंह सोलंकी मेरे घनिष्ठ ‘मित्र’ हैं. इन्हें पत्रकारिता का शौक है. अगर आपके पत्र में इन्हें काम मिल जाए तो मुझे बेहद खुशी होगी.”

इस खत के नीचे इंदु लाल याग्निक के दस्तखत थे. ये महागुजरात आंदोलन का दौर था. इंदु लाल याग्निक इस आंदोलन के अगुवा थे. गुजरात की जनता ने उन्हें नया नाम दिया था, “इंदु चाचा’. माधव सिंह सोलंकी और इंदु लाल याग्निक की उम्र के कई दशक का फर्क था, लेकिन खत में उनके लिए संबोधन के तौर पर ‘मित्र’ शब्द का इस्तेमाल किया गया था. इंद्रवदन मेहता ने खत पढ़ने के बाद अखबार के एडिटर कपिलराय मेहता को अपने कमरे बुलाया और माधव सिंह को काम पर रखने के लिए कहा. कपिलराय मेहता ने माधव सिंह सोलंकी को अंग्रेजी के कुछ लेख और गुजराती टेलीप्रिंटर थमा दिया. दो महीने तक वो टेलीप्रिंटर पर अंग्रेजी के लेखों का अनुवाद करते रहे. दो महीने बाद उन्हें 80 रुपए माहवार पर नौकरी में परमानेंट कर दिया गया. गुजरात समाचार में करीब दो साल काम करने के बाद गुजराती अखबार ‘लोकनाथ’ के मैगजीन सेक्शन का एडिटर बना दिया गया. तनख्वाह हो गई 125 रुपए प्रतिमाह.

एक पोस्टकार्ड जिस पर विधायकी का टिकट चस्पा था

माधव सिंह सोलंकी उस समय गांधी आश्रम में रह रहे थे. लोकनाथ अखबार में नौकरी के साथ-साथ वकालत की पढ़ाई भी जारी थी. इस समय उनके एक सहपाठी थे हामिद कुरैशी. कुरैशी बचपन से ही साबरमती आश्रम में रहते आए थे. माधव और हामिद की मुलाकात भी यहीं हुई थी. ऐसे में आए 1957 के विधानसभा चुनाव. उस समय गुजरात बॉम्बे प्रेसीडेंसी का हिस्सा हुआ करता था. हामिद ने अपने दोस्त माधव को बतौर कांग्रेस उम्मीदवार चुनाव लड़ने के लिए कहा. नौजवान माधव ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया. माधव गरीब परिवार से आते थे. उन्होंने हामिद से कहा-

“मुझे वकालत पूरी करके पैसे कमाने हैं ताकि अपने परिवार की मदद कर सकूं.”

बाबूभाई जशभाई पटेल सोलंकी के ससुर ईश्वरभाई के घनिष्ट मित्र थे.
बाबूभाई जशभाई पटेल सोलंकी के ससुर ईश्वरभाई के घनिष्ठ मित्र थे.

इस बात की खबर बाबू जशभाई पटेल को लगी. वो उस समय बॉम्बे प्रेसीडेंसी के उप-मुख्यमंत्री हुआ करते थे. बाबू जशभाई पटेल माधव सिंह सोलंकी के ससुर ईश्वरभाई के घनिष्ठ मित्र हुआ करते थे. उन्होंने बॉम्बे से एक खत ईश्वरभाई को भेजा. इस खत में लिखा था कि अगर आपके दामाद को इस चुनाव में कांग्रेस की तरफ से खड़ा कर दिया जाए तो कैसा रहेगा? आगे की कहानी माधव सिंह सोलंकी एक इंटरव्यू में कुछ इस तरह से बयान करते हैं-

“बाबूभाई जशभाई पटेल का पोस्टकार्ड लेकर मेरे ससुर मेरे पास साबरमती आश्रम पहुंचे. मैंने उन्हें विधानसभा चुनाव लड़ने से मना कर दिया. इसकी वजह मैंने उन्हें वही बताई जो हामिदभाई को पहले बता चुका था. मुझे अपने परिवार की मदद करने के लिए पैसा कमाना जरूरी था. मैं अपने ससुर को मना करके इस मामले से खुद को बरी कर चुका था. उधर बॉम्बे में प्रदेश कांग्रेस कमिटी की बैठक चल रही थी. बाबूभाई ने मेरे ससुर को खत भेजा तो था लेकिन उधर से कोई जवाब आया नहीं. उन्होंने इसे ‘हां’ समझकर मेरा नाम आगे कर दिया. इस तरह मेरा नाम उम्मीदवार की लिस्ट में आ गया. दूसरे दिन जब अखबार में यह लिस्ट छपी तो मुझे अपनी उम्मीदवारी की जानकारी मिली.”

इस तरह एक पोस्टकार्ड के मार्फ़त माधव सिंह सोलंकी की सियासत में एंट्री हुई. इसे लिखने वाले थे बाबूभाई पटेल. वही बाबूभाई पटेल जिनकी सरकार गिराकर 1976 के साल में माधव सिंह सोलंकी पहली बार मुख्यमंत्री बने. 1957 का विधानसभा चुनाव उन्होंने बोरसाड साउथ विधानसभा से लड़ा. सामने थे निर्दलीय उम्मीदवार खोड़ाभाई परमार. इस मुकाबले में उन्हें मिले 16740 वोट जबकि खेड़ाभाई सिर्फ 13432 वोट ही हासिल कर पाए. इस तरह वो पहली बार विधानसभा पहुंचे. 1962 में पृथक गुजरात राज्य में पहली बार चुनाव हुए. जीवराज मेहता के नेतृत्व में वो पहली बार रेवन्यू मिनिस्टर बने. इसके बाद 1975 तक हर कांग्रेस सरकार में मंत्री रहे.

बदलती वफादारियों दौर में मुख्यमंत्री

1975 के विधानसभा चुनाव में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं था. जनसंघ के 67, कांग्रेस (ओ) के 70 और चिमनभाई पटेल के किसान मजदूर लोक पक्ष के 12 विधायकों की बदौलत बाबूभाई पटेल सूबे के मुख्यमंत्री बने थे. इस गठबंधन को नाम दिया गया था ‘जनता मोर्चा’. आपातकाल लगने के करीब नौ महीने बाद चिमनभाई पटेल ने अपनी वफादारी बदल ली और फरवरी 1976 में जनता मोर्चा की सरकार गिर गई.

यह आपातकाल का दौर था और कांग्रेस (ओ) के विधायकों ने तेजी से अपनी वफादारी बदलनी शुरू की. दिसंबर की शुरुआत में कांग्रेस (आई) के खेमे में विधायकों की संख्या 75 से बढ़कर 104 हो चुकी थी. इंदिरा गांधी के कहने पर माधव सिंह सोलंकी ने दिसंबर के दूसरे सप्ताह में राज्यपाल के सामने सरकार बनाने का दावा पेश किया. 24 दिसंबर को उन्होंने राज्य के सातवें मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली.

गुजरात के 'आया राम-गया राम' के दौर में माधव सिंह सोलंकी पहली मुख्यमंत्री बने
गुजरात के ‘आया राम-गया राम’ के दौर में माधव सिंह सोलंकी पहली मुख्यमंत्री बने

यह सरकार ज्यादा दिन चल न सकी. 1977 के मार्च में इंदिरा गांधी ने लोकसभा चुनाव की घोषणा कर दी. केंद्र में कांग्रेस की ऐतिहासिक हार हुई. मोरारजी देसाई देश के नए प्रधानमंत्री बने. नतीजतन गुजरात में फिर से सियासी उठा-पटक का दौर शुरू हो गया. कांग्रेस (ओ) और जनसंघ में राजनीतिक विलय हो गया. केंद्र की तर्ज पर इसका नाम जनता पार्टी रखा गया. बागी विधायकों की घर वापसी शुरू हुई और कांग्रेस एक बार फिर से 75 के आंकड़े पर आ गई. ऐसे में 10 अप्रैल 1977 को माधव सिंह सोलंकी सरकार ने सदन में बहुमत खो दिया और वो सत्ता से बेदखल हुए.

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