राजधानी रांची की तरफ़ आदिवासियों का पैदल मार्च

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जल, जंगल, ज़मीन पर अपने पुस्तैनी हक़ को लेकर झारखण्ड राज्य के आदिवासी लंबे समय से आंदोलित हैं। और जब सरकार ने उनकी मांगे अनसुनी कर दी है तो वो अब सड़क पर उतर आए हैं। लगभग 10,000 की संख्या में आदिवासी नौजवानों, छात्रों, महिलाओं से लेकर बुजुर्गों तक का ये जत्था राजधानी रांची की तरफ कुंच कर चुका है। इनकी प्रमुख मांगें-

1) जनजातीय अधिकारों को लागू करने के लिए एक जनजातीय विभाग का गठन
2) किसी भी तरह के भूमि अधिग्रहण से पहले ग्राम सभा से अनुमति लेने की मांग
3) आदिवासियों के खिलाफ ग़लत तरीके से दर्ज किए गए केसों को वापस लेना
4) सरकार “वन अधिकार अधिनियम 2006” पूरी तरह से 6 महीने में लागू कराना
5) वन उत्पादों के न्यूनतम समर्थन मूल्य और विनिमय के संबंध में ग्राम सभा के माध्यम से वनवासियों को NTFP तक पहुंच बढ़ाना
6) CNT और SPT एक्ट को कड़ाई से लागू करने की मांग
7) सामुदायिक ज़मीन को भूमि बैंक से मुक्त करने की मांग
– ज़मीन अधिग्रहण कानून 2013 को तत्काल लागू करने की मांग

अपनी इन प्रमुख मांगों को लेकर आंदोलनकारी आदिवासियों का मार्च 20 फरवरी को हजारीबाग के संत कोलम्बस स्टेडियम से चला है और इनका उद्देश्य रांची तक जाकर अपनी मांगों को सरकार से मनवाना है। इस मार्च में जो आंदोलनकारी हैं वे बेहद दूरदराज के इलाकों से आये हैं। जिनके पास शायद खोने के लिए कुछ भी नहीं है। मार्च के दौरान अपना पेट भरने के लिए ये लोग अपनी पीठ पर अपना अपना खाने का राशन तक साथ लेकर चल रहे हैं। दिनभर की यात्रा के बाद ये जहां रुकते हैं वहां ठंड से बचने के लिए इनके सर के ऊपर तिरपाल तक का बंदोबस्त नहीं है। ये लोग खुले में ठंड से लोहा लेते हुए सो रहे हैं।

आंदोलनकारियों को रास्ते में जन समर्थन भी भरपूर मिल रहा है। कई जगह लोग इनके लिए पानी लेकर आ रहे हैं तो कुछ लोग अपनी तरफ से अनाज दान कर रहे हैं।

फिलहाल आंदोलनकारी तीन दिन से सड़क पर हैं लेकिन सरकार की तरफ से बातचीत की कोई भी पहल नहीं हुई है। फिर भी आंदोलनकारी इससे हतोत्साहित नहीं हैं। वे दृढ़ता से अपने संघर्ष के रास्ते पर आगे बढ़ने को संकल्पित हैं।


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