क्या ट्राइबल सबप्लान का नाम बदलने से आदिवासियों का भला होगा?

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केंद्र सरकार एक बार फिर ट्राइबल सबप्लान (टीएसपी) का नाम बदलने जा रही है लेकिन क्या इससे कुछ हासिल होगा?

केंद्र सरकार एक बार फिर ट्राइबल सबप्लान (टीएसपी) का नाम बदलकर डेवलपमेंट एक्शन प्लान फॉर शेड्यूल्ड ट्राइब करने की तैयारी में है। इससे पहले योजना आयोग को भंग कर बने नीति आयोग ने भी टीएसपी का नाम बदलकर शेड्यूल्ड ट्राइब कंपोनेंट कर दिया था। लेकिन क्या नाम बदलने से आदिवासियों को फायदा होगा। टीएसपी के रूप में आदिवासियों के लिए जारी होने वाली निधि को उनके कल्याण के बजाय उन्हें उजाड़ने पर खर्च किया जा रहा है।  

क्या सरकार ट्राइबल सबप्लान (टीएसपी) का फंड आदिवासियों के कल्याण पर खर्च कर रही है? कम से कम कोयला और खान मंत्रालय में ऐसा कतई नहीं हो रहा। सूचना के अधिकार (आरटीआई) से मिले दस्तावेज बताते हैं कि इन मंत्रालयों ने टीएसपी का फंड आदिवासियों के कल्याण के बजाय उन कामों पर खर्च किया जिनसे आदिवासियों के सामने मुश्किलें खड़ी होंगी। दस्तावेजों के मुताबिक, कोयला मंत्रालय ने टीएसपी का फंड कोयले के भंडार पता करने और खुदाई आदि पर व्यय किया जबकि खान मंत्रालय ने खनिजों के भंडार पता लगाने के लिए सर्वे और मैपिंग के िलए इस फंड का उपयोग किया।

आदिवासियों के सामाजिक-आर्थिक कल्याण के लिए टीएसपी की शुरुआत 1974-75 में की गई थी। योजना आयोग (जिसे खत्म कर नीति आयोग बना दिया गया है और टीएसपी का नाम बदलकर शेड्यूल्ड ट्राइब कंपोनेंट) ने हर तमाम मंत्रालयाें और विभागों के लिए टीएसपी के लिए फंड निर्धारित किया। उदाहरण के लिए ग्रामीण विकास विभाग के लिए 17.5 प्रतिशत, स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग के लिए 10.7 प्रतिशत, पेयजल एवं स्वच्छता विभाग के लिए 10 प्रतिशत, भूमि सुधार विभाग के लिए 10 प्रतिशत, जनजातीय मामलों के मंत्रालय के लिए 100 प्रतिशत, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के लिए 8.2 प्रतिशत, कोयला मंत्रालय के लिए 8.2 प्रतिशत और खान मंत्रालय के लिए 4 प्रतिशत निर्धारित है।

कुल मिलाकर संपूर्ण बजट का 8.6 प्रतिशत हिस्सा टीएसपी के लिए निर्धारित किया गया है। जनजातीय मामलों के मंत्रालय के अनुसार, कुल 37 मंत्रालय व विभागों को टीएसपी का फंड जारी किया जाता है। कुल 289 योजनाएं टीएसपी में शामिल हैं। लेकिन हैरानी की बात यह है कि किसी सरकार ने अब तक पूरा फंड जारी ही नहीं किया। उदाहरण के लिए 2018-19 के केंद्र की तमाम योजनाओं के लिए बजटीय व्यय 10,14,451 करोड़ रुपये निर्धारित किया गया। इस बजट का 8.6 प्रतिशत यानी 87,248 करोड़ रुपये आदिवासियों के कल्याण पर खर्च होने चाहिए लेकिन सरकार ने टीएसपी के लिए 39,135 करोड़ रुपये ही आवंटित किए।

यह निर्धारित बजट (8.6 प्रतिशत) के बजाय 3.86 प्रतिशत ही है। दूसरे शब्दों में कहें तो सरकार ने आधा बजट भी नहीं दिया। 2014-15 में कुल अनुमानित बजट का 1.84 प्रतिशत, 2015-16 में 1.13 प्रतिशत और 2016-17 में 1.21 प्रतिशत हिस्सा ही टीएसपी को आवंटित किया गया। इसी तरह 2017-18 में निर्धारित बजट का महज 1.53 प्रतिशत ही टीएसपी को नसीब हुआ।

जो बात सबसे चौंकाती है, वह यह कि उपलब्ध कराई जा रही धनराशि भी खर्च नहीं की जा रही है। 13 मार्च 2018 को जनजातीय मामलों के मंत्रालय द्वारा जारी विज्ञप्ति के अनुसार, 2014-15 से 2016-17 के बीच 62,947.82 करोड़ रुपये टीएसपी के तहत खर्च किए गए जबकि इस दौरान 76,392 करोड़ रुपये आवंटित किए गए। यह स्थिति तब है जब तमाम राजनीतिक दल और प्रधानमंत्री आदिवासियों के हितैषी होने का दावा कर चुके हैं। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राष्ट्रीय विकास परिषद की 15वीं बैठक को 27 जून 2015 को संबाधित करते हुए कहा था, “टीएसपी वार्षिक योजनाओं के साथ पंचवर्षीय योजनाओं में शामिल होने चाहिए और प्रावधान होना चाहिए कि ये नॉन ट्रांसफरेबल और नॉन लैप्सेबल हों।”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अपने भाषणों में खुद को आदिवासियों का हितैषी बताने से नहीं चूकते। चाहे वह आदिवासी महिला को मंच पर चप्पल पहनाना हो या आदिवासी कार्निवल में हिस्सा लेना। 25 अक्टूबर 2016 को मोदी ने कहा, “यह आवश्यक है कि विकास की प्रक्रिया में जनजातीय समुदायों को भी भागीदार बनाए जाए।”

कहां जा रहा है टीएसपी का फंड?

योजना आयोग के मुताबिक, टीएसपी में केवल वही योजनाएं शामिल की जानी चाहिए जिनसे आदिवासियों को प्रत्यक्ष लाभ सुनिश्चित हो। आदिवासियों को शोषण से बचाना टीएसपी को दूसरा अहम लक्ष्य है। लेकिन क्या ऐसा हो रहा है? यह जानने के लिए आरटीआई कार्यकर्ता संजॉय बासु ने कोयला मंत्रालय से 2011-12 से 2017-18 और खान मंत्रालय से 2010-11 से 2017-18 तक का टीएसपी के खर्च का ब्यौरा मांगा। उन्हें मिले दस्तावेज बताते हैं कि ट्राइबल सबप्लान की जो धनराशि अनुसूचित जनजातियों के आर्थिक और सामजिक विकास पर खर्च होनी चाहिए थी, कोयला मंत्रालय ने वह धनराशि कोयला कंपनियां को आवंटित कर दी। इन कंपनियों ने टीएसपी के उद्देश्य से उलट काेयले के भंडार खोजने, खुदाई और खदानों की सुरक्षा-संरक्षण पर इस धनराशि को खर्च किया। दूसरी तरफ खान मंत्रालय ने भी टीएसपी का फंड ज्योलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (जीएसआई) और इंडियन ब्यूरो ऑफ माइन (आईबीएम) को दे दिया। जीएसआई ने खान मंत्रालय से प्राप्त 66.21 करोड़ रुपये कोलकाता, नागपुर, जयपुर, हैदराबाद, लखनऊ और शिलॉन्ग क्षेत्र में खनिजों का भंडार पता लगाने के लिए किए गए सर्वे और मैपिंग पर खर्च किए। आईबीएम को खान मंत्रालय ने 9.3 करोड़ रुपये टीएसपी फंड दिया लेकिन उसने इस फंड का इस्तेमाल ही नहीं किया।

कोयला मंत्रालय ने कोयला कंपनियों और सेंट्रल माइन प्लानिंग एंड डिजाइन इंस्टीट्यूट लिमिटेड (सीएमपीडीआईएल) को जारी टीएसपी निधि का विवरण उपलब्ध कराया है। मंत्रालय ने इस अवधि के दौरान 205 करोड़ रुपये कोयला कंपनियों और सीएमपीडीआईएल को स्थानीय स्तर पर कोयले के भंडार पता लगाने, खुदाई और संरक्षण-सुरक्षा से जुड़ी परियोजनाओं को दिए।

सीएमपीडीआईएल ने 2011-12 से 2017-18 के बीच कोयले के भंडार पता लगाने के लिए कुल 41.59 करोड़ रुपये प्राप्त किए जबकि खुदाई के लिए कंपनी को 82.32 करोड़ रुपये कोयला मंत्रालय ने दिए। टीएसपी मद से कोयले के भंडार पता लगाने के लिए उपलब्ध कराई गई धनराशि का इस्तेमाल कंपनी ने छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और ओडिशा के 20 ब्लॉक में कोयले के भंडार खोजने में खर्च किए। इनमें से 14 ब्लॉक में कंपनी ने ज्योग्राफिकल रिपोर्ट मुहैया करा दी है जबकि छह जगह अभी खुदाई चल रही है।

कंपनी ने खुदाई के लिए जारी टीएसपी की धनराशि का इस्तेमाल छत्तीसगढ़ के नौ ब्लॉक, ओडिशा के दो ब्लॉक और मध्य प्रदेश के चार ब्लॉक में किया। चौंकाने वाली बात यह है कि सीएमपीडीआईएल ने कोयले के भंडार पता लगाने के लिए मिली टीएसपी की धनराशि से तीन गुणा अधिक खर्च किया जिसकी भरपाई जनरल फंड से की गई। सीएमपीडीआईएल ने इन परियोजनाओं पर कुल 122.87 करोड़ रुपये व्यय किए जबकि खुदाई पर 233 करोड़ रुपये खर्च कर डाले।

कोलकाता स्थित कोल कंट्रोलर कार्यालय ने आरटीआई के जवाब में बताया कि ट्राइबल सबप्लान की निधि सेंट्रल कोलफील्ड लिमिटेड (सीसीएल), सिंगरेनी कोयलरीज कंपनी लिमिटेड (एससीसीएल) और महानदी कोलफील्ड लिमिटेड (एमसीएल) को दी गई। इन कंपनियों ने इस निधि से झारखंड, आंध्र प्रदेश, ओडिशा और तेलंगाना में स्टोइंग और प्रोटेक्टिव वर्क के काम कराए। 2012-13 में इन सरकारी कंपनियों ने 12.71 करोड़ रुपये इन कामों पर खर्च कर दिए। 2013-14 में 13.10 करोड़ रुपये, 2014-15 में 15.17 करोड़ रुपये, 2015-16 में 13.94 करोड़ रुपये, 2016-17 में 16.53 करोड़ रुपये और 2017-18 में 16.40 करोड़ रुपये स्टोइंग और प्रोटेक्टिव वर्क पर खर्च किए गए। इन कंपनियों ने 2012-13 से 2017-18 के बीच कुल 87.85 करोड़ रुपये टीएसपी का फंड खर्च किया।

टीएसपी फंड से कोयला कंपनियों और उनके द्वारा किए गए काम पर सवाल खुद जनजातीय मामलों के मंत्रालय की 15 सितंबर 2015 को अंतर मंत्रालय समन्वय समिति की बैठक में उठाया गया था। बैठक में यह मुद्दा उठा कि कोयला मंत्रालय ने टीएसपी का फंड खुदाई और कोयले के भंडार पता लगाने पर कैसे खर्च कर दिया? बैठक मंंे यह भी कहा गया कि कोयला मंत्रालय के टीएसपी पर किए गए खर्च पर तुरंत ध्यान देने की जरूरत है और नीति आयोग के परामर्श से नई योजना की जरूरत है ताकि कोयला मंत्रालय के टीएसपी फंड का उचित इस्तेमाल हो सके।

टीएसपी फंड का दुरुपयोग नया नहीं

योजना आयोग ने साल 2010 में टीएसपी और एससीएसपी (शेड्यूल्ड कास्ट सबप्लान) के दिशानिर्देशों की समीक्षा के लिए एक टास्क फोर्स गठित की थी। टास्क फोर्स के अध्यक्ष नरेंद्र जाधव (देखें, अमल के लिए दंड का प्रावधान होना चाहिए) ने को बताया कि टीएसपी का फंड कुछ सालों से जरूर बढ़ रहा है और सरकार इसके लिए अपनी पीठ थपथपा रही है लेकिन टीएसपी की निगरानी का कोई तंत्र अब तक विकसित नहीं किया गया है। इसी वजह से जो पैसा आदिवासियों के कल्याण पर खर्च होना चाहिए, वह दूसरी जगह स्थानांतरित कर दिया जाता है।

आदिवासियों के हक की कानूनी लड़ाई लड़ने वाले अधिवक्ता और कोयला व खनन मामलों के जानकार ने को बताया “आदिवासी सबसे अधिक कोयला और खान मंत्रालय से प्रभावित होते हैं। आदिवासी क्षेत्रों में कोयले के भंडार और खनिज मिलने पर उन्हें अपनी जड़ों से विस्थापित किया जाता है। यह हैरानी भरा है कि आदिवासियों को बुरी तरह प्रभावित करने वाला कोयला और खान मंत्रालय आदिवासियों के कल्याण पर खर्च किया जाने वाला टीएसपी का पैसा उन्हें उजाड़ने पर खर्च कर रहा है।

कोयले के भंडार, खुदाई और खदानों की सुरक्षा पर खर्च किया गया टीएसपी फंड इसकी मूल भावना के खिलाफ है।” सुदीप बताते हैं “जिन मंत्रालयों के लिए पास आदिवासियों के कल्याण के लिए कोई योजना नहीं है, उन्हें टीएसपी की धनराशि संबंधित राज्यों को भेज देनी चाहिए ताकि राज्य इस फंड उचित उपयोग कर सकें।”

ऐसा नहीं है कि केवल कोयला और खान मंत्रालय में ही टीएसपी फंड की बंदरबांट हुई है। 2015 में जारी नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक, टीएसपी की अवधारणा आदिवासी बहुल राज्यों जैसे अरुणाचल प्रदेश और मेघालय आदि में लागू नहीं है क्योंकि वहां आदिवासी आबादी 60 प्रतिशत से अधिक है। सीएजी ने पाया कि इन राज्यों के लिए भी 706.87 करोड़ रुपये टीएसपी फंड जारी किया गया। इसके अलावा 326.21 करोड़ रुपये उन राज्यों और संघ शासित प्रदेशों को जारी किए गए जहां 2011 की जनगणना के मुताबिक आदिवासी आबादी ही नहीं है।

सीएजी रिपोर्ट के मुताबिक, 2010 में योजना आयोग के दिशानिर्देशों में कहा गया था कि जिस टीएसपी फंड का उपयोग न हो पाया हो, वित्तीय वर्ष के अंत में उसे नॉन लैप्सेबल पूल में शामिल कर जनजातीय मामलों के मंत्रालय को दे दिया जाए ताकि आदिवासियों के लिए बनी योजनाएं लागू हो सकें। गाइडलाइन के जारी होने के 4 साल बाद भी इस पर अमल नहीं किया गया।

संसद की लोक लेखा समिति (पीएसी) के अध्यक्ष व सांसद मल्लिकाकार्जुन खड़गे ने 18 दिसंबर 2017 को टीएसपी पर अपनी रिपोर्ट संसद में प्रस्तुत की। रिपोर्ट में टीएसपी के कार्यान्वयन में कई खामियां पाई गईं। मसलन, फंड जारी करने में विशिष्ट नियमों को न अपनाना, कमजोर कार्यक्रम प्रबंधन, निगरानी प्रणाली की कमी और सूचना प्रदान करने वाले कार्यक्रमों को लागू न करना। कमिटी ने पाया कि वित्तीय वर्ष के अंत में फंड को टीएसपी के नॉन लैप्सेबल पूल में ट्रांसफर नहीं किया गया जिसे बाद में इस्तेमाल किया जा सके।

नरेंद्र जाधव बताते हैं, “टीएसपी फंड का दूसरी जगह ट्रांसफर करना अपवाद नहीं है, यह नियमित होता जा रहा है। आदिवासियों के लिए निर्धारित पैसा उनके कल्याण पर खर्च हो इसके लिए जरूरी है कि टीएसपी की ठीक से मॉनिटरिंग हो।”

“अमल के लिए दंड का प्रावधान होना चाहिए”

ट्राइबल सबप्लान के दिशानिर्देशों के समीक्षा के लिए योजना आयोग ने नरेंद्र जाधव की अध्यक्षता में टास्क फोर्स गठित की थी। आयोग के सदस्य रहे चुके नरेंद्र जाधव अभी राज्यसभा सांसद हैं। उन्होंने टीएसपी के मुद्दे पर से बातचीत की

ट्राइबल सबप्लान के क्रियान्वयन में क्या कमियां आपको मिलीं?

पहली कमी यह थी कि लोकसंख्या के अनुपात में टीएसपी फंड का निर्धारण नहीं होता था। दूसरा, जो फंड निर्धारित होता था, वह पूरी तरह खर्च नहीं नहीं हो पाता था। इसके अलावा तीसरी कमी यह थी कि टीएसपी फंड दूसरी जगह स्थानांतरित कर दिया जाता था। ये समस्याएं अब भी आम हैं।

टीएसपी के क्रियान्वयन में समस्याएं क्यों सामने आईं और इसका निदान क्या है?

टीएसपी की गाइडलाइन योजना आयोग द्वारा बनाई गईं लेकिन योजना आयोग कार्यकारी निकाय नहीं था। उनके दिशानिर्देश पर राज्य या केंद्र सरकार अमल नहीं करती है तो उनसे पूछने वाला कोई नहीं था। क्योंकि वह गाइडलाइन थी नियम या कानून नहीं जिन्हें मानना अनिवार्य हो। इसके समाधान का एक विचार तब आया जब 12वीं पंचवर्षीय योजना की तैयारी चल रही थी। तब बहुत से समूह बनाए गए थे। तब एक विचार यह आया कि योजना आयोग की गाइडलाइन के बजाय केंद्रीय मंत्रिमंडल की गाइडलाइन बनाई जाए। अगर ऐसा हो जाता तो अमल ज्यादा अच्छा हो जाता। जहां अमल नहीं होता है, वहां दंड का प्रावधान हो सकता था। दूसरी सोच यह थी कि कायदा बनाए जाए। यह प्रक्रिया शुरू भी हो गई लेकिन अंजाम तक नहीं पहुंची।

कोयला मंत्रालय से आदिवासी बहुत प्रभावित होते हैं। क्या इसका टीएसपी फंड दूसरी जगह स्थानांतरित करना सही है?

ये बहुत गलत बात है। पैसा आदिवासियों के कल्याण पर ही खर्च होना चाहिए। समाज में खाई को मिटाना के लिए तो और अधिक खर्च करना चाहिए लेकिन हालात यह है कि निर्धारित फंड ही नहीं दिया जा रहा है। मैंने अपनी रिपोर्ट में भी विस्तार से लिखा है टीएसपी का फंड स्थानांतरित नहीं होना चाहिए।

नई पॉलिसी क्या हो सकती है?

योजना आयोग को खत्म करने के बाद प्लान और नॉन प्लान खर्च का अंतर खत्म हो गया है। अब पंचवर्षीय योजना ही नहीं रहा। टीएसपी के लिए कारगर योजना यह हो सकती है कि केंद्र सरकार की सारी योजनाओं के कुल खर्च में लोकसंख्या के अनुपात में खर्च निर्धारित करना चाहिए। यह टीएसपी की मूलभावना से अनुकूल भी होगा।

योजना आयोग और खुद प्रधानमंत्री मनमोहन िसंह कह चुके हैं टीएसपी का फंड नॉन लैप्सेबल और नॉन डायवर्टेबल होना चाहिए। आखिर इस पर अमल क्यों नहीं होता?

दिशानिर्देश और सुझाव कभी अनिवार्य नहीं होते, चाहे वह योजना आयोग के हों या किसी और के। यह सरकार पर निर्भर है कि दिशानिर्देशों को मानना है कि नहीं। टीएसपी फंड के लिए योजना आयोग के दिशानिर्देशों पर इसी वजह से अमल नहीं हुआ। अमल के लिए कायदे की जरूरत है। अगर अमल नहीं होता है दंड का प्रावधान भी जरूरी है। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद में मैंने यह मुद्दा उठाया था कि आयोग में निगरानी तंत्र की आवश्यकता है ताकि यह देखा जा सके कि जो पैसा योजनाओं के लिए जा रहा है वह जरूरतमंदों पर खर्च होता है या नहीं।



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