बेहिसाब खनन से तबाह हो रहे आदिवासी

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झारखंड के पाट यानी नेतरहाट में. हमारे इलाके में भारत का बॉक्साइट भरा है. इलाका हमारा है, लेकिन इस पर राज बिड़ला करता है. राजधानी रांची से हम करीब 170 किलोमीटर दूर हैं. इसलिए पहाड़ों से हमारी चीख वहां पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देती है. मोबाइल के जरिए मीडिया यहां पहुंच गया है, पर मीडिया वाले इधर झांकते भी नहीं. बिड़ला ने सबकी खूब खातिरदारी कर रखी है. हमारी सुनने वाला कोई नहीं है और दिन-रात बिड़ला के डम्फर हमारी छाती रौंद रहे हैं. इसलिए हम अपनी कहानी अपने बच्चों को बताने के लिए, आप जैसे लोगों को दिखाने के लिए इस तरह की तस्वीरें बना रहे हैं. अपनी दीवालों पर. अपने दिमागों में और काल की छाती पर. इसलिए कि ‘समुद्र मंथन’ खतम नहीं हुआ है. न ही असुर लोग पूरी तरह से मरे हैं. हम आज भी ज़िंदा हैं.’

नेतरहाट , झारखंड । फोटो साभार : अज्ञात आदिवासी

गुरदरी बॉक्साइट माइंस के आसपास के गांवों में बसे असुर आदिवासियों की ये आह ‘असुर आदिवासी विज़डम डॉक्यूमेंटेशन इनीशिएटिव’ फेसबुक पेज पर मौजूद है. वे ‘असुर नेशन डॉट इन’ नाम से वेबसाइट और फेसबुक पेज के ज़रिए अपनी बात दुनियाभर में पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं.

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इस पेज पर लिखी जाने वाली हिंदी में आमतौर पर कोई शब्द या वाक्यांश की कोई गलती नहीं होती. फिलहाल वे अंतरराष्ट्रीय आदिवासी भाषा वर्ष के तहत अपनी भाषा, संस्कृति, पुरखों की ज्ञान परंपरा और अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

नौ अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस मनाने के साथ ही इस अभियान को आगे बढ़ा रहे हैं. विश्व आदिवासी दिवस पर 11 और 12 अगस्त को रांची में भारत के पूर्वी और पूर्वोत्तर क्षेत्र के आदिम आदिवासियों का साहित्यिक सम्मेलन करने की भी योजना है.



आयोजन साहित्य अकादमी के सहयोग से होगा. इन राज्यों से असुर, बिरहोर, बिरजिया, हिल खडिय़ा, कोरवा, परहिया, माल पहाडिया, सौरिया पहाडिया, लोधा, शबर, तोतो, बोंडा, डोंगरिया कोंध, जुआंग, सौरा आदि और पूर्वोत्तर के त्रिपुरा से रेयांग तथा मणिपुर से मरम नागा सूचीबद्ध हैं.

बेहिसाब खनन से तबाह हो रहे आदिवासी

असुर आदिवासियों का कहना है कि यूनेस्को की खतरे में पड़ी विश्व भाषाओं के एटलस के हिसाब से असुर आदिवासी भाषा खतरे की सूची में है. बिड़ला के बॉक्साइट खदानों ने हमारा जीवन तबाह कर दिया है. टाटा ने लोहा (स्टील) बनाने के हमारे पारंपरिक ज्ञान को हथियाकर हमें हाशिये पर पहुंचा दिया है.

पुरखों की हत्याओं के विजयोत्सव से आहत

असुर आदिवासियों का कहना है कि हिंदू कथा-पुराण हमें राक्षस कहते हैं और हमारे रावण, महिषासुर आदि पुरखों की हत्याओं का विजयोत्सव मनाते हैं. इन सब परिस्थितियों के बीच हम असुर आदिवासियों ने अपना अस्तित्व बचाने और भाषा-संस्कृति के संरक्षण के लिए नेतरहाट के जोभीपाट गांव में ‘असुर आदिवासी विजडम अखड़ा’ केन्द्र की स्थापना की है. वे अपील कर रहे हैं कि जीने में मदद कीजिए, सहायता दीजिए ताकि अपनी भाषा-संस्कृति और ज्ञान परंपराओं को बचा सकें.

दुनियाभर के वैज्ञानिकों की सलाह बेअसर

ये कितनी अजीब बात है कि दुनियाभर के वैज्ञानिक जहां आदिवासियों को ही अब ग्रह बचाने का जरिया मान रहे हैं और वहीं आदिवासियों को अपना वजूद बचाने के लिए जीने-मरने का संघर्ष करना पड़ रहा है. भारत में तो आदिवासियों को जंगल से बाहर निकाल फेंकने का प्रकरण सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है. ऐसा लगता है, जैसे पूरी व्यवस्था के अंग और धार्मिक सोच भी इन आदिवासियों के खिलाफ खड़ी हो गई है और उन्हें न बख्शने की ठान ली है.

सरकार की बेरुखी का सबूत

ये महज आरोप नहीं है, तथ्य है. कहानी-किस्सों की धार्मिक परंपराओं पर तर्क बहुत आगे जा सकता है. फिलहाल सरकार के रुख को जान लेना ही काफी है.

आदिवासियों के बारे में गुमनाम खबर ये है कि वित्त वर्ष 2018-19 में विशेष रूप से कमज़ोर आदिवासी समूहों के कल्याण की योजना के तहत आवंटित धनराशि पांच प्रतिशत से भी कम खर्च की गई. ये जानकारी चार जुलाई को राज्यसभा दी गई.

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जनजातीय मामलों के मंत्री अर्जुन मुंडा ने राज्यसभा में बताया कि वित्त वर्ष 2018-19 के लिए मंत्रालय ने राज्यों को 250 करोड़ रुपये जारी किए. इसमें से केवल 12.3 करोड़ रुपये का उपयोग किया गया. यानी स्वीकृत राशि के 5 प्रतिशत से भी कम. वर्ष 2017-18 में योजना के तहत 239.46 करोड़ रुपये मंजूर किए, जबकि राज्यों ने 223.19 करोड़ के उपयोग की सूचना दी. इसी तरह 2016-17 में, राज्यों ने स्वीकृत 338 करोड़ रुपये के 319.96 करोड़ रुपये के उपयोग की सूचना दी.

असुर आदिवासी अखाड़ा | फोटो साभार : अज्ञात आदिवासी

अर्जुन मुंडा ने सदन को ये भी बताया कि इस योजना का मकसद सामाजिक-आर्थिक विकास की योजना के साथ ही समुदायों की संस्कृति और विरासत को बरकरार रखने का प्रयास होता है. 18 राज्यों में 75 पहचाने गए विशेष तौर पर कमज़ोर जनजातीय समूहों के विकास किया जाता है, जिसमें अंडमान और निकोबार द्वीप समूह केंद्र शासित प्रदेश भी शामिल हैं. समूह के कमजोर होने की कसौटी कृषि स्तर, स्थिर या घटती जनसंख्या, बेहद कम साक्षरता और अर्थव्यवस्था का निर्वाह का स्तर शामिल है.



बहरहाल, हकीकत यही है कि आदिवासियों को पानी तक के लिए पहाड़ पर खुद ही नहर बनाकर, स्कूल या फिर इलाज की सामूहिक कोशिशों पर जीना पड़ रहा है. उनके आसपास सरकारी अमला सिर्फ खौफ पैदा करने पहुंचता है शायद.

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कथित सभ्य लोगों की असभ्यता

सुषमा असुर एक वाकया बताती हैं, ‘पहले कलक्टर ऑफिस से, फिर एसपी ऑफिस से और फिर थाने से फोन आता है, बार-बार, कई बार. सुषमा असुर कौन है? नेतरहाट के बाज़ार में हमको सादा ड्रेस में कुछ लोग घेर लेते हैं और इसी बीच गांव में घर पर 10-12 कमांडो टाइप फौजी पहुंच जाते हैं. बडक़ा-बडक़ा राइफल-बंदूक पकड़ के. सीन ऐसा कि मानो कोई आतंकवादी को पकड़ने स्पेशल पुलिस-फौज आयी है. गांव-घर के लोग सहमे-डरे हैं. लोग सोच रहे हैं सुषमा ने ऐसा क्या कर दिया. हम घर पहुंचते हैं तो पता चलता है कि एक आईएएस की बीवी जो दिल्ली का किसी कॉलेज में प्रोफेसरी करती है, उसको अपने रिसर्च के सिलसिले में हमसे मिलना है. हमको गुस्सा आ जाता है. सिर्फ हमसे मिलने के लिए एतना ताम-झाम? अरे! सीधे मिलने आ जाते. पूरे गांव को छावनी किसलिए बना दिए? तुम डराने आई हो कि जानकारी लेने? ई कौन-सा तरीका है रिसर्च का?’

यूनिटी फ्लैग से बुलंद हो रहा ‘दुनिया के आदिवासियों एक हो’ का नारा

सरकार समझे या न समझे, लेकिन आदिवासियों को अपने होने की अहमियत पर कोई संदेह नहीं है. इसी वजह से वे पूरी दुनिया में मौजूद आदिवासी समूहों को एक ध्वज के नीचे आकर कुदरत के खजाने को बचाने की कोशिश में लग गए हैं. इस काम में उनका यूनिटी फ्लैग फहराना शुरू हो चुका है.

गुजरात की आदिवासी छात्रा लता चौधरी ने इस ध्वज का पहला नमूना बनाया. इसमें गोल घेरे में कई रंगों के गोले हैं, जो विभिन्न देशों में मौजूद आदिवासियों की संस्कृति को अभिव्यक्त करते हैं और बीच में मौजूद पंख उनकी एकता को प्रदर्शित करता है.

लता चौधरी कहती हैं कि आदिवासी एक दूसरे के माध्यम से पूरी दुनिया में जुड़े हैं, लेकिन उनके अधिकारों की जानकारी नहीं है या फिर वे मिल नहीं रहे. जबकि किताबें ये तक कहती है कि आदिवासियों को वीज़ा-पासपोर्ट के बगैर सरहदें पार करने का हक है.

इस ध्वज को क्या अन्य देशों में मौजूद आदिवासियों ने भी अपना लिया है? इस सवाल पर लता कहती हैं, ‘सभी ने तो नहीं, लेकिन कई देशों में और खासतौर पर भारत के अधिकांश समूहों ने अपना लिया है. हम स्वदेशी जनजातियों और स्वदेशी अधिकारों के पैरोकारों को 2012 के दिसंबर से दुनिया भर में स्वदेशी एकता ध्वज भेज रहे हैं.’

(आशीष सक्सेना स्वतंत्र पत्रकार हैं. यह उनका निजी विचार है.)

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