बेहद खतरनाक है मोदी सरकार का वन कानून का नया प्रस्ताव

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भारत में जंगल की परिभाषा विवादास्पद है. भारत सरकार का पर्यावरण मंत्रालय पिछले दो दशकों से यह परिभाषित करने की कोशिश कर रहा है कि जंगल क्या है?

जंगल में रहन वालों के अधिकारों की रक्षा के लिए साल 2006 में वन अधिकार अधिनियम लागू हुआ.

हाल ही एक राष्ट्रीय दैनिक में आई खबर के अनुसार केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय ने इस अधिनियम की व्याख्या की है. इसके मुताबिक कई राज्यों के वन विभागों का स्थानीय जंगलों पर मनमाना अधिकार हो जाएगा.

  • वन अधिकार अधिनियम 2006 से लाखों वनवासियों और वनाश्रितों को सुरक्षा प्रदान की गयी थी. लेकिन महाराष्ट्र सरकार ने साल 2014 में केंद्रीय कानून को कमजोर करने वाला कानून बनाया है.
  • सामाजिक कार्यकर्ता इस अधिनियम को कमजोर करने की आलोचना करते हुए कहते हैं कि इससे लाखों वनवासियों को मिला अधिकार छिन जाएगा.

बेहद खतरनाक है मोदी सरकार का वन कानून का नया प्रस्ताव●


◆मोदी सरकार ने वन कानून में परिवर्तन के लिए नया प्रस्ताव पेश किया है। यह कानून अंग्रेजों ने 1927 में लागू किया था। मोदी सरकार के नए प्रस्ताव के मुताविक इस प्रस्ताव के मुताविक
● 1927 के कानून को पूरी तरह से बदल दिया जाएगा। इस प्रस्ताव में वन अधिकारियों को असीमित शक्तियां मिल जाएंगी। इतनी कि वे कानूनी तौर पर किसी पर भी गोली तक चला सकेंगे। मौत हो जाने पर सामान्य कानूनी प्रक्रिया के तहत कार्रवाई भी नहीं होगी।
◆1927 के वन कानून में इस परिवर्तन के प्रस्ताव के लिए केंद्र सरकार ने एक ड्राफ्ट तैयार किया है. इस ड्राफ्ट को 7 जून तक विभिन्न राज्य सरकारों के समक्ष सलाह मशविरे के लिए पेश किया जाना है। इस ड्राफ्ट में एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि वन अधिकारियों के पास वनों की ग्राम सभाओं के फैसले पर वीटो करने का अधिकार होगा।
◆इसके साथ ही इस ड्राफ्ट में वन अधिकार एक्ट(2006) को भी कमजोर करने का प्रस्ताव है। मतलब वन अधिकार एक्ट(2006) के तहत जिन आदिवासियों को विरासत के तौर पर वनों और वन संपदा के ऊपर संवैधानिक अधिकार मिला हुआ है, वो अब पूरी तरह से वन अधिकारियों के खाते में चला जाएगा।
● वन अधिकारी अगर चाहेंगे तो ही आदिवासियों को उनका ये अधिकार देंगे। वहीं केंद्र ने यह प्रस्ताव भी रखा है कि राज्यों के वन मामलों में केंद्र सीधे तौर पर दखल दे सकेगा।
◆बता दें कि 1927 में अंग्रेजी हुकूमत ने जो भारतीय वन कानून लागू किया था, वो पूरी तरह से आदिवासियों का दमन करने और वन संपदा को लूटने के लिए था। आजादी के बाद की सरकारों ने भी कमोबेश यही किया। ऐसे अनेक मामले हैं जिनमें इस कानून की आड़ में निर्दोष आदिवासियों को सताया गया।
●विशेषज्ञ मानते हैं कि यह कानून मध्य भारत में नक्सलवाद को बढ़ावा देने के लिए बहुत हद तक उत्तरदायी है। इसके बाद भी सरकार ने इसे और अधिक जनविरोधी बनाने का प्रस्ताव रखा है।
◆ यह 1927 के वन कानून का जनविरोधी चरित्र ही था कि भारत सरकार को मजबूर होकर 2006 में वन अधिकार एक्ट पास करवाना पड़ा था। इस एक्ट से यह कोशिश की गई थी कि आदिवासियों और दूसरे वनाश्रितों के साथ जो अन्याय हुआ है, उसे सुधारा जा सके।
● वहीं दूसरी तरफ वन प्रशासन लगातार शिकायत करता रहा है कि जनसंख्या विस्फोट और विकास के नए मॉडल के बीच वनों का संरक्षण करने के लिए उसके पास पर्याप्त शक्तियां नहीं हैं-


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