असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों के लिए पेंशन की घोषणा मज़ाक है

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असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों से हर महीने योगदान की उमीद करना असंभव है. जब पूरे साल रोज़गार मिलता ही नहीं है तो फिर योगदान कैसे संभव है.

अंतरिम बजट भाषण में वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने प्रधानमंत्री श्रमयोगी मानधन योजना की घोषणा की. इस योजना के तहत 60 साल से ज़्यादा उम्र के असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों को 3000 रुपये की मासिक पेंशन मिलेगी. योजना का लाभ उन्हें मिलेगा, जिनकी मासिक आय 15 हजार या इससे कम है. मजदूरों को 100 रुपए का मासिक योगदान भी देना होगा. इतना ही योगदान सरकार भी करेगी. योजना के लिए 500 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं.
 
वित्त मंत्री ने दावा किया कि योजना का लाभ असंगठित क्षेत्र के 10 करोड़ मज़दूरों को मिलेगा. उन्होंने कहा कि ये योजना अगले पांच साल में असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों के लिए दुनिया की सबसे बड़ी पेंशन योजना बन सकती है. लेकिन मोदी सरकार के वित्तमंत्री जिस योजना को एतिहासिक बताने में जुटे हैं वो दरअसल असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के साथ मज़ाक है, क्यूं आईए समझते हैं.

कौन है असंगठित क्षेत्र के मज़दूर?

कानून में व्यवसाय को संगठित और असंगठित क्षेत्र के आधार पर बांटा गया है. जहां 10 से ज़्यादा मज़दूर काम कर रहे हैं और काम में बिजली का उपयोग होता है या फिर 20 से ज़्यादा मज़दूर एक साथ काम कर रहे हैं तो इसे संगठित क्षेत्र माना जाता है. जैसे की फ़ैक्ट्री, सरकारी दफ़्तर, निजी दफ़्तर आदि. इसके अलावा सारे काम जैसे की रेहड़ी -पटरी के मज़दूर, घरेलू कामगार आदि असंगठित क्षेत्र में आते हैं. 

लेकिन क्षेत्र और रोज़गार के प्रकार में बड़ा फ़र्क़ है. संगठित क्षेत्र में भी ऐसे मज़दूर हैं जिन्हें सामाजिक सुरक्षा योजना के तहत प्रॉविडेंट फ़ंड, मेडिकल बीमा, मातृत्व अवकाश (मेटरनिटी) आदि का लाभ नहीं मिलता. तब भी इनकी गिनती असंगठित मज़दूरों में होती है. कांट्रेक्चुअल (संविदा) कर्मचारी या मज़दूर भी असंगठित क्षेत्र मे आते हैं. 

इससे ये साफ़ है कि रोज़गार के आधार पर भी मज़दूरों को अलग-अलग क्षेत्र में बंटे हैं. एनएसएसओ के आंकड़ो के मुताबिक़ मज़दूरों की एक छोटी तादाद असंगठित क्षेत्र में रोज़गार के आधार पर संगठित मानी जाती है. अगर किसी भवन निर्माण में 20 से ज़्यादा मज़दूर एक साथ काम कर रहे हैं तो उन्हें संगठित मज़दूर माना जाएगा. भले ही वो काम असंगठित क्षेत्र में क्यों नही कर रहे हों. 

2009-10 के आकंडे बताते हैं कि हमारे देश में कुल कामकाजी लोगों की तादाद का लगभग 93 प्रतिशत हिस्सा असंगठित क्षेत्र में आता है.

क्या है इस योजना की सच्चाई ?

यह योजना एक पेंशन स्कीम है. जैसा कि बाक़ी पेंशन स्कीमों में होता है, कर्मचारी को अपने हिस्से का भुगतान करना पड़ता है. दूसरा हिस्सा एम्प्लॉअर यानी कि मालिक देता है. सरकार ने भी ठीक ऐसा ही किया है. एक मज़दूर जिसकी आमदनी 15000 रुपए महीना है, सरकार उससे 100 रुपए महीने लेगी और इतनी ही राशि सरकार भी जमा कराएगी. 

फ़र्ज़ कीजिए की एक मज़दूर की उम्र 20 साल है. वह हर साल 1200 रुपए का योगदान दे रहा है. उसे यह योगदान 40 सालों तक करना पड़ेगा. फिर उसे पेंशन का लाभ मिलेगा. 40 सालों में कुल 48000 रुपए की राशि जमा हो जाएगी. इतना सरकार भी देगी. जो अहम सवाल यहां है कि 3000 रुपये का मूल्य बाज़ार में 40 साल के बाद क्या होगा? अगर इसमें महंगाई दर को भी जोड़ दिया जाए तो ये रकम तब ऊंट के मुंह में जीरे के बराबर होगी.

क्या सही मायने में आसंगठित क्षेत्र के मज़दूरों को फ़ायदा मिलेगा?

एनएसएसओ के 2009-10 के आंकड़ों के मुताबिक़ असंगठित मजदूरों की कुल तादाद 47 करोड़ से अधिक है. इतनी बड़ी संख्या के लिए महज़ 500 करोड़ रुपए का आवंटन बहुत छोटी रक़म है. वहीं पिछले आठ सालों में कुल कामकाजी आबादी में भी बड़ा इज़ाफ़ा भी हुआ है.

जेएनयू में सेंटर फ़ॉर इन्फ़ॉर्मल सेक्टर एंड लेबर स्टडीज़ की प्रो.अर्चना प्रसाद का कहना है, ‘यह योजना असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों को बरगलाने की कोशिश है कि उनके भविष्य का ध्यान रखा जाएगा. इसमें उनकी मौजूदा स्तिथि में सुधार का कोई आसार नहीं है. सरकार ने इनके लिए कुछ भी नहीं किया है. सरकार ने सार्वजनिक सामाजिक सुरक्षा के लिए कोई क़दम नहीं उठया है.’

पूर्व सांसद और सेंटर फ़ॉर इंडियन ट्रेड यूनियन के महासचिव तपन सेन ने बताया, ‘असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों से हर महीने योगदान की उमीद करना असंभव है. जब पूरे साल रोज़गार मिलता ही नहीं है तो फिर योगदान कैसे संभव है. असंगठित्त क्षेत्र का मज़दूर रोज़गार के लिए पलायन भी करता है, ऐसे में हर महीने योगदान करना मुश्किल है. काम के अभाव में ऐसा हो सकता है कि मज़दूर किसी महीने अपना हिस्सा नहीं दे पाए. इस वजह से अगर पेंशन का लाभ नहीं मिलता है तो यह एक और जुमला है.’

उन्होंने सरकार के रवैये को ग़ैरज़िम्मेदाराना बताया. सेन ने कहा, ‘इस वक़्त यह सरकार कुछ भी लागू नहीं कर सकती. अगले दो महीने में चुनाव होने हैं. पिछले चार सालों यह सरकार सिर्फ़ कारपोरेट घरानो को टैक्स रियायत देने में लगी थी. आज जब उनका कार्यकाल ख़त्म होने को है तब लोक लुभावने वादे कर रही है. अगर सरकार को ज़िम्मेदारी का अहसास होता तो रोज़गार के साधनों पर ज़ोर देती लेकिन उसका ज़िक्र बजट भाषण में कहीं नहीं था. यह जनता को बेवक़ूफ़ बनाने की कोशिश है.’

ग़ौर करने वाली बात है कि बीजेपी के 2014 के चुनावी घोषणा पत्र में असंगठित क्षेत्र के मज़दूर के लिए पेंशन का ज़िक्र था. लेकिन पिछले पांच बजट में इस पर कोई चर्चा नहीं हुई. जबकि इस दौर में संसद के अंदर विपक्षी पार्टियों ने मज़दूरों की स्थिति और अन्य मज़दूरों से जुड़े मामले उठाए गए थे. इन चार सालों में तीन बार मज़दूरों ने देशव्यापी हड़ताल भी की, तब बीजेपी मौन थी.

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