बस्तर: के युवाओं की भागीदारी से सशक्त होता आदिवासी संघर्ष

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एक तरफ पूरी दुनिया में पूंजीवादी व्यवस्थाओं ने अपनी सत्ता जमा के सभी संसाधनों पर कब्जा कर लिया है, वहीं दूसरी तरफ बचे कुछ संसाधनों के साथ जीवन निर्वहन कर रहे आदिवासी समुदाय – संसाधनों, जमीन, एवम पर्यावरण के संरक्षण के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं। आप सभी शायद आदिवासियों पर हो रहे आत्याचरों से अच्छे से वाकिफ होंगे क्यूंकि ये अत्याचार निरंतर प्रक्रिया सी बन गयी है। हालांकि इस लेख में हम आदिवासियों पर हो रहे अत्याचारो से दूर उनके संघर्षो, और संघर्षो से हो रहे सकारात्मक बदलाओं की बात करेंगे।, लड़ाई सड़को की हो या कागज की, आज की नई आदिवासी पीढ़ी ने संघर्षो को नई दिशा दी है। कानूनों के होते बदलाओ से लेकर, 10 लाख वन निवासियों की बेदखली, पहाड़ो के चुपचाप कम्पनियो को बेचने तक के निर्णयों का आदिवासियों द्वारा विरोध देश के विभिन्न भागों में हुआ है।

छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के सांस्कृतिक हक की बात हो या जल, जंगल, ज़मीन; ऐसे अनेकों लड़ाइयों को उस क्षेत्र के युवाओं ने बहुत शसक्त तरीके से लड़ा है। बस्तर के बैलाडीला के 13 नंबर नन्दराज पहाड़, आदिवासियों की सांस्कृतिक विरासत है, जिसे सरकार द्वारा अडानी को चुपचाप सौपने का अथक प्रयास भी असफल रहा, साथ ही आंदोलन के दबाव के कारण सरकार को इस विषय पर जांच करनी पड़ी। संघर्षों के फलस्वरूप, लोहंडीगुड़ा बस्तर के 10 गावो में टाटा स्टील की विदाई हुई और उसके साथ किसानों को उनकी जमीन भी वापसी की गई.

जल जंगल जमीन के संरक्षण सवर्धन के मुद्दों पर बस्तर के आदिवासी युवा एवम समाज के सदस्यों द्वारा सरकार पर वन अधिकार कानून 2006 के बेहतर क्रियान्वयन के लिए लगातार दबाव बनाया गया फलस्वरूप कांग्रेस ने विगत चुनाव में आदिवासियों की मांगों को अपने मेनिफेस्टो में महत्वपूर्ण स्थान दिया। अन्यथा इसपे बात करने वाला कोई भी राजनैतिक दल नही था, साथ ही ग्राम सभाओ को शसक्त करने केंद्रीय पेशा कानून 1996 के रूल्स बनाने के लिए निरंतर दबाव बनाया जा रहा है।

समाज के बुद्धिजीवी युवाओ द्वारा रूल्स बनाने मसौदा तैयार किया जा रहा है, साथ ही बस्तर संभाग के कई इलाकों में पांचवी अनुसूची के प्रावधान ,पेशा कानून 1996 एवम वन अधिकार कानून पे कार्यशालाओं का आयोजन भी आदिवासी समुदाय के युवाओं द्वारा किया जा रहा है।

आज पूरे बस्तर में संसाधनों के प्रबंधन, संवर्धन एवम पुनरुत्पादन के लिए लगभग 500 से ज्यादा ग्रामसभाएं अपने सामुदायिक वन अधिकार के दावे प्रक्रियाधीन हैं, वहीं 50 से ज्यादा दावे जमा किये जा चुके हैं। इसी तरह वाइल्डलाइफ ग्रुप द्वारा सुप्रीम कोर्ट में वन अधिकार कानून के दुरुपयोग संबंधी याचिका, जिसके कारण पूरे देश मे 10 लाख आदिवासियों के विस्थापन की नौबत बनी हुई है, जिसमें छत्तीसगढ़ राज्य से लगभग 2 लाख वननिवासियों पर खतरा मंडरा रहा है, का भी पुरजोर विरोध छतीशगढ़ के विभिन्न आदिवासी समुदायों एवं युवाओ के द्वारा किया गया है।

फलस्वरूप छत्तीसगढ़ राज्य सरकार को एफिडेविट में सुप्रीम कोर्ट को कहना पड़ा कि कानून का अब तक सही क्रियान्वयन नही किया गया है। छत्तीसगढ़, बस्तर से लेकर सरगुजा तक अनेको प्राकृतिक संपदाओं का धनी रहा है वही सत्ता करीब कम्पनियो औऱ धनकुबेरों द्वारा लगातार प्राकृतिक संपदाओं को लूटने की योजना बनाया जा रहा है। 

एक तरफ राज्य के आदिवासी अपनी विरासत को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं वहीं दूसरी तरफ कॉर्पोरेट प्रेमी सरकार कॉरपोरेट घरानों को मुनाफा देने में ज्यादा दिलचस्पी दिखा रही है। लेकिन हमारे सामने यह भी प्रश्न उठता है कि आखिर कब तक आदिवासी अपनी जल जंगल जमीन, सरकार और कॉर्पोरेट से बचा पाएंगे? सत्ता परिवर्तनों से व्यवस्थाओं में परिवर्तन नही आती, ये लड़ाई सीधी तौर पे जंगल में रहने वाले आदिवासियों का पूजीवादी व्यवस्थाओं के खिलाफ है जो कि आदिवासियों की विरासत, संस्कृति को ध्वस्त करते आ रहा है, इन लड़ाइयों को नई दिशा और राह देकर समाज के युवाओ ने संघर्षो को ताकत और मजबूती दी है और ये कभी न कभी जीत के करीब जरूर ले जाएगा।

फोटो : बैलाडीला, बस्तर में आदिवासी, अडानी कंपनी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करते हुए। (अनुभव शोरी) 

By: अनुभव शोरी कोईतुर समाज के आदिवासी अधिकार कार्यकर्त्ता हैं और उत्तर बस्तर कांकेर में स्थित हैं. 

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